उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context२८८ उपदेशसाहस्री सिद्ध है, अतः प्रत्यक्षविरुद्ध प्रमाणान्तर से उस (भेद) का प्रतिषेध कैसे होगा ? भेदज्ञान की निन्दा इस प्रकार की गई है कि “यह परमात्मा अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है, उसने कुछ नहीं जाना है। अर्थात् वह कुछ नहीं जानता है¹।” “जो ब्रह्म को आत्मा से भिन्न देखता है, ब्रह्म उसे त्याग देता है²।” “जो यहाँ (इस लोक में) नानावत् देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है³।” इत्यादि श्रुतियाँ इसमें प्रमाण हैं। तात्पर्य यह है कि असंसारी ईश्वर का प्रत्यक्ष न होने से, उसके भेद का प्रत्यक्ष भी आत्मा में हो पाना संभव नहीं है। सुखी-दुःखी आदि का आत्मा में अनुभव करना केवल भ्रम है। भ्रम होने से भेद का अध्यवसाय कर नहीं सकते। अतः अनन्यथासिद्धार्थ श्रुति के द्वारा प्रतिषिद्ध हुए भेद को प्रमाण समझना उचित नहीं है ॥ २६ ॥ एता एव श्रुतयो भेदप्रतिपत्तेः संसारगमनं दर्शयन्ति ॥२७॥ हृदयस्पर्शिनी एता इति—ये भेदप्रतिषेधक श्रुतियाँ ही भेदज्ञान से संसार की प्राप्ति को भी प्रदर्शित करती हैं। अर्थात् ऊपर उल्लिखित श्रुतियाँ केवल भेदनिषेध ही नहीं कर रही हैं, किन्तु भेददर्शी व्यक्ति के लिये अनर्थप्राप्तिरूप प्रत्यवाय की सूचना भी देती हैं। यह परमेश्वर मुझसे विलक्षण कोई अन्य ही है, और मैं भी उससे विलक्षण संसारी जीव हूँ, ऐसा समझकर जो व्यक्ति अन्य देवता की उपासना करता है, अर्थात् श्रुति का तात्पर्य भेद में होना ही समझना है, उसने सचमुच तत्त्व को नहीं जाना, यही समझना चाहिये। क्योंकि भेदज्ञान, अविद्या से हुआ करता है। भेददर्शी के लिये श्रुति ने बताया है कि “उसे देवपशुत्व की प्राप्ति होती है⁴।” पराधीनता से बढ़कर कोई दूसरा दैन्य अथवा कष्ट नहीं है। ब्रह्म, भेददर्शी के विषय में सोचता है कि यह भेददर्शी मुझ आत्मरूप को अनात्मरूप से देखता है, अतः वह उस भेददर्शी का हित नहीं करता, अर्थात् वह उससे मानो द्वेष ही करने लगता है। अर्थात् उसे तत्त्व विमुख कर देता है। 'नानेव' यहाँ पर 'इव' शब्द नानात्वदर्शन में आभासत्व सूचित करने के लिये है। वह मृत्यु से मृत्यु को अर्थात् एक संसार से दूसरे संसार को और दूसरे से तीसरे संसार को इस प्रकार अनन्तकाल तक अनर्थपरम्परा को ही प्राप्त करता रहता है ॥ २७ ॥ अभेदप्रतिपत्तेश्च मोक्षं दर्शयन्ति सहस्रशः । “स आत्मा तत्त्वमसि” इति परमात्मभावं विधाय “आचार्यवान् पुरुषो वेद” इत्युक्त्वा “तस्य तावदेव चिरम्” इति मोक्षं दर्शयन्ति अभेद- विज्ञानादेव । सत्याभिसन्धस्यातस्करस्येव दाहाद्यभावदृष्टान्तेन संसाराभावं दर्शयन्ति । भेददर्शनादसत्याभि- सन्धस्य संसारगमनं दर्शयन्ति तस्करस्येव दाहादिदृष्टान्तेन ॥२८॥ हृदयस्पर्शिनी अभेदप्रतिपत्तेश्चेति—इस प्रकार भेददृष्टि की निन्दा बताकर और अभेददृष्टि की फलवत्ता होने से उनकी प्रशंसा करते हुए वही उपादेय है। अभेदज्ञान के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति को हजारों श्रुतियों ने बताया है। अन्वय- व्यतिरेक व्याप्ति दोनों में है, इसी बात को श्रुत्यर्थ के द्वारा बताते हुए उक्त अर्थ को पुष्ट कर रहे हैं। “पुरुषं सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्ति⁵” इस खण्ड में इस अर्थ को बताया गया है। “राजपुरुष किसी पुरुष को हाथ पकड़कर लाते हैं और कहते हैं कि इसने धन चुराया है, इसके लिये परशु तपाओ। यदि उसने चोरी की है तो वह अपने को झूठा सिद्ध १. ( बृ. उ. १।४।१० ) २. ( बृ. उ. २।४।६, ४।५।७ ) ३. ( बृ. उ. ४।४।१९, कठ उ. ४।१० ) ४. “यथा पशुरेवं स देवानाम्” ।—( बृ. उ. १।४।१०, ४।४।१९ ) ५. “पुरुष सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत्स्तेयमकार्षीत्परशुमस्मै तपतेति । स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते ॥ १ ॥ अथ यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥ २ ॥ ( छां. उ. ६।१६।२ )