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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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शिष्यानुशासनप्रकरणम् २८९ करता है और तप्त परशु को छूने से जल जाता है तथा मार दिया जाता है। किन्तु यदि उसने चोरी नहीं की है तो वह अपने को सत्यवादी सिद्ध करता है। वह उस तप्त परशु से नहीं जलता, और उसे छोड़ दिया जाता है। उसी प्रकार भेददर्शी असत्यनिष्ठ होने के कारण संसारबन्धन में बँधता है और अभेददर्शी सत्यनिष्ठ होने के कारण उससे छूट जाता है।” अभेदज्ञान के द्वारा मोक्षप्राप्ति को बताने वाली श्रुतियाँ इस प्रकार हैं— “वह आत्मा है और वही तू है¹।” इस प्रकार जीव के परमात्मभाव का विधान कर “आचार्यवान् पुरुष को ही ज्ञान होता है²।” ऐसा कहकर “उसके लिये तभी तक विलम्ब है³।” इस प्रकार अभेदज्ञान से ही श्रुतियाँ मोक्ष का प्रदर्शन कर रही हैं। तथा अचौर पुरुष के दाहादि के अभाव के समान दृष्टान्त द्वारा सत्यनिष्ठ पुरुष को संसारप्राप्ति का अभाव और चौर के दाहादि दृष्टान्त से भेददर्शी असत्यनिष्ठ पुरुष को संसार की प्राप्ति दिखलायी है ॥ २८ ॥ “त इह व्याघ्रो वा” इत्यादिना च अभेददर्शनात् “स स्वराड्भवति” इत्युक्त्वा, तद्विपरीतेन भेददर्शनेन संसारगमनं दर्शयन्ति— “अथ येऽन्यथाऽतो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति” इति प्रतिशाखम्। तस्मान्मृषैवैवमवादी: “ब्राह्मणपुत्रोऽदोऽन्वयः संसारी परमात्मविलक्षणः” इति ॥२९॥ हृदयस्पर्शिनी अभेददर्शनादिति— सुषुप्ति में परमात्मा के साथ अभेदसम्पत्ति होने पर भी वैसा अभेदज्ञान न रहने के अपराध से ही पुनः व्याघ्रादि भाव से उठे हुए (जगे हुए) लोगों के लिये संसार का अविच्छेद बताती हुई श्रुति परमात्मा के साथ अभेद के रूप में होने वाला आत्म ज्ञान ही मोक्ष प्राप्ति में हेतु है--यह सूचित कर रही है। “वह यहाँ व्याघ्र अथवा⁴ (सिंह, भेड़िया, भालू, कीट, पतंग, या मच्छर) जो कुछ होता है, सुषुप्ति से जागने पर वही हो जाता है” इस श्रुति से भी अभेद ही दिखलाया गया है। तथा “वह स्वराट् (स्वतन्त्र सम्राट) हो जाता है”⁵ ऐसा कहकर उसके विपरीत “जो इससे भिन्न प्रकार से जानते हैं, उनके अधिपति दूसरे होते हैं, तथा वे क्षयशील लोकों को प्राप्त होते हैं”⁶ इत्यादि श्रुतियों द्वारा प्रत्येक शाखा में भेददर्शन के द्वारा संसार की प्राप्ति दिखलाई है। अतः तुमने यह मिथ्या ही बताया है कि ‘मैं परमात्मा से भिन्न अमुक गोत्र में उत्पन्न हुआ संसारी ब्राह्मणपुत्र हूँ’। तात्पर्य यह है कि भेददर्शन की निन्दा एवं अभेददर्शन की प्रशंसा के द्वारा जीव और ब्रह्म का अभेद निश्चित किया गया है। अतः आत्मा में ब्राह्मणत्वादि का अभिमान करना मिथ्या है, यह सिद्ध किया गया है ॥ २९ ॥ तस्मात्— प्रतिषिद्धत्वाद्द्भेददर्शनस्य, भेदविषयत्वाच्च कर्मोपादानस्य, कर्मसाधनत्वाच्च यज्ञोपवीतादेः कर्मसाधनोपादानस्य परमात्माभेदप्रतिपत्त्या प्रतिषेधः कृतो वेदितव्यः। कर्मणां तत्साधनानां च यज्ञोपवीतादीनां परमात्मऽभेदप्रतिपत्तिविरुद्धत्वात्, संसारिणो हि कर्माणि विधीयन्ते, तत्साधनानि च यज्ञोपवीतादीनि, न परमात्मनोऽभेददर्शिनः। भेददर्शनमात्रेण च ततोऽन्यत्वम् ॥३०॥ हृदयस्पर्शिनी तस्मादिति— अतः शिष्य ने पूर्वगत २५ वे वाक्य से जो यह कहा था कि ‘मैं पूजा, प्रणामादि वर्णाश्रम- विहित कर्मानुष्ठान के द्वारा परमेश्वर की आराधना करूँगा’ यह दृष्टि भी सम्यक् दृष्टि नहीं है, वह भेददृष्टि ही है, जिसका अभेदश्रुति ने बाध कर दिया है। भेददृष्टि का प्रतिषेध किया होने से और कर्मानुष्ठान भेदविषयक होने से तथा यज्ञोपवीतादि, कर्मानुष्ठान का साधन होने से परमात्मा के साथ अभेदज्ञान हो जाने पर कर्म के साधन और १. (“स आत्मा तत्त्वमसि” ।—छां. उ. ६।८।१६ ) २. “आचार्यवान् पुरुषो वेद” ।—(छां. उ. ६।१४।२ ) ३. “तस्य तावदेव चिरम्” ।— (छां. उ. ६।१४।२ ) ४. “त इह व्याघ्रो वा” ।— (छां. उ. ६।९।२ ) ५. “स स्वराट् भवति” ।—(छां. उ. ७।२५।२ ) ६. “अथ येऽन्यथाऽतो विदुरन्ये राजा नस्ते क्षय्यलोका भवन्ति” ।— (छां. उ. ७।२५।२ ) ३७