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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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शिष्यानुशासनप्रकरणम् २९१ नमात्मत्वेन मां च संसारिणं परमात्मत्वेनाग्निमिव शीतत्वेन *प्रतिपद्येय ? संसारी च सन्, सर्वाभ्युदयनिः- श्रेयससाधनेऽधिकृतः, अभ्युदयनिःश्रेयससाधनानि कर्माणि तत्साधनानि यज्ञोपवीतादीनि कथं परित्यजेयम् ? इति ॥३३॥ हृदयस्पशिनी स इति—आगम के आधार पर निरूपित किये गये ब्रह्मात्मैक्य को अब युक्ति से भी सुदृढ़ बनाने के लिए शिष्य के मुख से पुनः आक्षेप कराया जा रहा है। शिष्य गुरु से कहता है कि हे भगवन् ! देह (शरीर) के दहन या छेदन किये जाने पर जो वेदना (पीड़ा) होती है, वह तो प्रत्यक्ष है, उसी तरह क्षुधा (भूख) से होनेवाली पीड़ा (दुःख) का भी मुझे प्रत्यक्ष अनुभव होता है। तथा “यह आत्मा पापशून्य, रजोरहित, मृत्युरहित, शोकहीन, क्षुधाहीन, पिपासाहीन और सब प्रकार के गन्ध और रस से रहित है”१ इस प्रकार सभी श्रुतियों और स्मृतियों में यह आत्मा ही परमात्मा रूप से सुना जाता है। ऐसी स्थिति में इन लक्षणों से रहित तथा अनेक सांसारिक धर्मों से युक्त हुआ मैं अग्नि को शीतत्व- विशिष्ट समझने के समान परमात्मा को आत्मस्वरूप से और संसारी अपने-आपको परमात्मारूप से कैसे समझूँ ? तथा संसारी होने के कारण सर्वविध अभ्युदय और निःश्रेयस के साधनों में अधिकार रखता हुआ भी उन अभ्युदय और निःश्रेयस के साधनभूत कर्म एवं उनके साधनभूत यज्ञोपवीतादि को भी कैसे त्याग दूँ ? अतः ‘जीव-परमात्मानौ वस्तुतो भिन्नौ विरुद्धधर्मसंसर्गित्वात्, शीतोष्णवत्' यह आक्षेप करनेवाले शिष्य का अनुमान है। एवंच भेद तो तात्त्विक है, तब कर्म और तत्साधनभूत यज्ञोपवीतादि परित्यागात्मक संन्यास के लिए अवसर (प्रसंग) ही कहाँ है ? अर्थात् नहीं है ॥ ३३ ॥ तं प्रति ब्रूयात्—यदवोचो दह्यमाने छिद्यमाने वा देहे प्रत्यक्षा वेदनोपलभ्यते ममेति; तदसत् । कस्मात् ? दह्यमाने छिद्यमान इव वृक्ष उपलब्धुरुपलभ्यमाने कर्मणि शरीरे दाहच्छेदवेदनाया उपलभ्यमानत्वाद्दाहादिसमानाश्नयैव वेदना । यत्र हि दाहच्छेदो वा क्रियते तत्रैव व्यपदिशति दाहादिवेदनां लोकः, न वेदनां दाहाद्युपलब्धरीति । कथं क्व ते वेदनेति पृष्टः शिरसि मे वेदना, उरस्युदर इति वा, यत्र दाहादिस्तत्रैव व्यपदिशति, न तूपलब्धरीति । यद्युपलब्धरि वेदना स्यात् वेदनानिमित्तं वा दाहच्छेदादि, वेदनाश्रयत्वेनोपदिशेद्दाहाद्याश्रयवत् ॥३४॥ हृदयस्पर्शिनी त मिति—उस शिष्य से गुरु यह कहे—तुमने जो कहा कि ‘शरीर के दग्ध और छेदन किये जाने पर मुझे वेदना की उपलब्धि का प्रत्यक्ष अनुभव होता है’ किन्तु तुम्हारा यह कथन ठीक नहीं है। क्यों ठीक नहीं है ? क्योंकि दग्ध और छेदन किये जाते हुए वृक्ष के समान उपलब्धा को उपलब्ध होनेवाले उसकी उपलब्धि के कर्मभूत शरीर में ही दाह और छेदन की वेदना, उपलब्ध होने के कारण वह वेदना उन दाहादि के समान आश्रयवाली ही है। क्योंकि जहाँ दाह या छेदन किया जाता है, वहीं पर लोग उस दाहादि की वेदना का व्यपदेश (उल्लेख) किया करते हैं। दाहादि की उपलब्धि करनेवाले में नहीं। किस प्रकार ? (सो सुनो)—जब किसी से यह पूछा जाता है कि तुम्हारे कहाँ पर वेदना है ? तो ‘मेरे शिर में वेदना है अथवा हृदय में या पेट में वेदना है', इसी प्रकार जहाँ दाहादि होता है, वहीं उसकी वेदना भी वह बताता है, उस वेदना के उपलब्ध करनेवाले को नहीं बतलाता । यदि वह वेदना अथवा उसका निमित्त दाहच्छेदनादि, उपलब्धा में होता तो दाहादि के आश्रय के समान उसकी वेदना के आश्रयरूप से उसी का व्यपदेश करता। तात्पर्य यह है कि आक्षेप करनेवाले शिष्य के द्वारा उपस्थित किए गए अनुमान प्रयोग में गुरु, हेत्वसिद्धि दिखा रहे हैं। अनुमान में ‘जीवपरमात्मानौ' के द्वारा क्या उपाधिभेदविशिष्ट वस्तु का यथाप्रतिपत्ति निर्देश कर रहे हो, अथवा चैतन्यमात्राकार का निर्देश कर रहे हो ? प्रथम पक्ष में आकाशभेद के समान औपाधिक भेद वास्तविक ही १. (छां. उ. ८।१।५ )

  • प्रतिपद्येयम् ०—पाठान्तरम् ।
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