उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextहोने से बाध और व्यभिचार हैं। और भेदमात्र का साधन यदि कर रहे हो तो सिद्धसाधन है, इस अभिप्राय से द्वितीय पक्ष में असिद्धि है ॥ ३४ ॥
स्वयं च नोपलभ्येत चक्षुर्गतरूपवत् । तस्माद्दाहच्छेदादिसमाना श्रयत्वेनोपलभ्यमानत्वाद्दाहादि- वत्कर्मभूतैव वेदना । भावरूपत्वाच्च साश्रया तण्डुलपाकवत् । वेदनासमाना श्रय एव तत्संस्कारः स्मृति- समानकाल एवोपलभ्यमानत्वात्, वेदनाविषयः तन्निमित्तविषयश्च द्वेषोऽपि संस्कारसमाना श्रय एव । तथा चोक्तम्—
"रूपसंस्कारतुल्याधी रागद्वेषौ भयं च यत्। गृह्यते धीश्रयं तस्माज्ज्ञाता शुद्धोऽभयः सदा" ॥३५॥
हृदयस्पर्शिनी
स्वयं मिति—अन्य युक्ति भी बताते हैं—जैसे चक्षुगतरूप चक्षु के द्वारा ग्रहण नहीं किया जाता, वैसे ही आत्मगत वेदना का ग्रहण भी आत्मा के द्वारा नहीं होगा, अन्यथा कर्म-कर्तृ विरोध होगा। दाह, छेदन और वेदना ये तीनों समानाश्रय हैं, ऐसा अनुभव होने से दाहादि के तुल्य उनकी वेदना भी, वेत्ता या अनुभविता की कर्मभूत ही माननी होगी। तथा वह वेदना, कार्यरूप होने से तण्डुलपाक के समान साश्रय (आश्रययुक्त) भी है। और उसके संस्कार भी वेदना के समानाश्रय ही हैं। क्योंकि उसकी उपलब्धि वेदना के समान काल (जाग्रत्-स्वप्न) में ही होती है। सुषुप्ति में नहीं होती, क्योंकि उस समय वेदना का भी अभाव रहता है। अतः संस्कार, वेदना से साथ ही रहनेवाले हैं। उस वेदना के निमित्तभूत दाहादि के प्रति जो द्वेष है, वह भी संस्कारों के समानाश्रय ही है। ऐसा कहा भी है—"नील-पीतादि रूप और उनके संस्कार और तदनुकूल जो बुद्धि, राग, द्वेष और भय हैं, वे बुद्धि के ही आश्रित दिखाई देते हैं। अतः उनका ज्ञाता (आत्मा) तो सर्वदा शुद्ध और अभयरूप है१"। अभिप्राय यह है कि आत्मा वेदनाश्रय नहीं हो सकता। यहाँ पर शंका यह की जा सकती है कि वेदना का अर्थ तो 'दुःख' है, दुःख का जड़ देह में होना तो संभव नहीं है, क्योंकि सुख- दुःखादि धर्मों में चेतनाश्रयता रहती है, यह नियम है। यदि पुनः चेतन होता हुआ भी आत्मा, वेदनाश्रय न कहा जाय तो शरीर भी अचेतन है, वह भी वेदनाश्रय नहीं होगा। बौद्धों की तरह वेदना को निराश्रय (अनाश्रय) ही माना जाय, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि वह कार्यरूप है। अतः कह सकते हैं कि 'वेदना साश्रया कार्यत्वात् तण्डुल- पाकवत्'। 'कार्यत्वात्' हेतु को अप्रयोजक भी नहीं कह सकते। क्योंकि यदि वेदना को निराश्रय कहें तो उसके नष्ट होने पर संस्कार का भी अभाव होने से कालान्तर में उसका स्मरण न हो सकेगा। अथवा 'वेदना समानाश्रय एव तत्संस्कारः' कहकर हेतुसिद्धि की आशंका का भी परिहार किया जा सकता है। अर्थात् वेदना कार्यरूप न हो तो उसका संस्कार और स्मृति दोनों का होना असंभव होगा, तब कालान्तर में 'मेरे पैर में वेदना हुई थी' इत्यादि व्यवहार नहीं हो पाएगा। अथवा वेदना के साश्रय पक्ष में यदि कोई यह शंका करे कि वेदना यदि साश्रय है, तो वह आत्माश्रय ही होगी, क्योंकि उसके संस्कार-स्मृति आदि की उपलब्धि, आत्मा में ही होगी। तो इस आशंका का उत्तर देने के लिए 'वेदना समानाश्रय एव तत्संस्कारः' कहा गया है। अर्थात् यत्स्था वेदना होती है, तत्स्थ ही उसके संस्कार आदि होते हैं, अर्थात् जिसमें वेदना स्थित हो, उसी में उससे उत्पन्न हुए संस्कारादि होते हैं। वेदना, तत्संस्कार, स्मृति ये सब एकाश्रय हुआ करते हैं, ऐसा नियम है। वेदना तो उपलब्धि के कर्म में स्थित है, अतः उपलब्धा जो आत्मा है, उसमें वेदना के संस्कार को नहीं माना जा सकता। इसलिए वेदनाजन्य संस्कार को वेदनासमाना श्रय ही मानना चाहिए। क्योंकि जाग्रत्, स्वप्नावस्थारूप स्मृतिकाल में ही उसकी उपलब्धि होती है, सुषुप्ति काल में नहीं। अनुमान प्रयोग इस प्रकार होगा—'वेदनादिः अनात्माश्रयः अनात्मप्रत्ययकाल एवोपलब्धिगोचरत्वात्, देहकार्यादिवत्' । वेदना आदि के अनात्माश्रय होने में एक और भी कारण है। उस वेदना का जो निमित्त दाहच्छेद आदि है, तद्विषयक द्वेष भी संस्कारतुल्याश्रय अर्थात् अनात्माश्रय ही होगा। निष्कर्ष यह है—देह के कट जाने पर अथवा जल जाने पर 'मैं कट
१. ( उप. स. पद्य प्र. १५।१३ )