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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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शिष्यानुशासनप्रकरणम् २९५ स्मृतिभ्यश्च 'पूर प्राणिनः सर्व एव गुहाशयस्य'१, 'आत्मैव देवताः'२, 'नवद्वारे पुरे'३, 'समं सर्वेषु भूतेषु'४, 'विद्याविनयसंपन्ने'५, 'अविभक्तं विभक्तेषु'६, 'वासुदेवः सर्वम्'७ इत्यादिभ्य एक एवात्मा परं ब्रह्म सर्वसंसारधर्मविनिर्मुक्तस्त्वमिति सिद्धम् ॥३८॥ हृदयस्पर्शिनो स्मृतिभ्यश्चेति — उपर्युक्त श्रुत्युक्त अर्थ का समर्थन स्मृतियों ने भी किया है। “समस्त प्राणिवर्ग एक बुद्धि स्थित आत्मा के ही शरीर हैं”१, “समस्त देवता आत्मा ही है”२, “नवद्वार के पुर में देही रहता है”३, “सम्पूर्ण भूतों में समानरूप से विद्यमान”४, “विद्या-विनय सम्पन्न ब्राह्मण में”५, “भिन्न-भिन्न प्राणियों में अभिन्नरूप से स्थित”६, “सभी वासुदेव हैं”७—इत्यादि स्मृतिवाक्यों से भी तू समस्त सांसारिक धर्मों से रहित परब्रह्मस्वरूप एक आत्मा ही है, यह स्पष्ट होता है। तात्पर्य यह है कि जितने भी प्राणी हैं, वे सब एक ही आत्मा (गुहाशय) के शरीर हैं। अतः प्रत्येक शरीर का आत्मा भिन्न नहीं हैं ॥ ३८ ॥ स यदि ब्रूयात्—यदि “भगवन् अनन्तरोऽबाह्यः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः”८ कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव, सैन्धवघनवदात्मा सर्वमूर्तिभेदवर्जित आकाशवदेकरसः, किमिदं दृश्यते, श्रूयते वा, साध्यं साधनं वा साधकश्चेति श्रुतिस्मृतिलोकप्रसिद्धं वादिशतविप्रतिपत्तिविषयमिति ॥३९॥ हृदयस्पर्शिनी स यदीति—यदि वह शिष्य पुनरपि यह कहे कि हे भगवन् ! यदि अन्तर-बाह्य से रहित, बाहर-भीतर विद्यमान एवं अजन्मा तथा पूर्णतया प्रज्ञानघन ही सैन्धवघन के समान सम्पूर्ण मूर्त भेदों से रहित आकाश के समान एकरस आत्मा है, तो श्रुति-स्मृति और लोक में प्रसिद्ध तथा शतशः वादियों के विवाद का विषयभूत यह साध्य, साधन और साधकरूप भेद कैसा देखा-सुना जाता है ? अर्थात् ब्रह्मात्मैकत्व यद्यपि श्रुति-स्मृति और न्याय से सिद्ध किया गया है, तथापि लौकिक-वैदिक व्यवहार का उससे विरोध दिखाई देता है। लोकव्यवहार में गृह, क्षेत्र, कोश आदि 'साध्य', उसके प्राप्ति का साधन प्रतिग्रह- सेवा, विजय, युद्ध आदि, और उसके साधक —अधिवर्ग ब्राह्मणादि दिखाई देते हैं। उसी तरह वैदिक व्यवहार में स्वर्ग आदि—साध्य, उसका साधन—याग आदि, और उसके साधक—इच्छुक जन होते हैं। इस प्रकार ऐहलौकिक और पारलौकिक निर्दिष्ट त्रिक सुनाई पड़ते हैं ३९ ॥ आचार्यो ब्रूयात्—अविद्याकृतमेतद्यदिदं दृश्यते, श्रूयते वा, साध्यं साधनं साधकश्चेति । परमार्थतस्त्वेक एवात्मा अविद्यादृष्टेरेनेकवदवभासते*—तिमिरदृष्ट्याऽनेकचन्द्रवत् । “यत्र वा अन्यदिव स्यात्”९, “यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति”१०, “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति”१०, “अथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पम्...अथ यदल्पं तन्मर्त्यम्”११ इति, “वाचारम्भणं विकारो १. (आपस्तंबीयत अध्यात्म पटल-४) २. (मनु. १२।११९) ३. (भ. गी. ५।१३) ४. (भ. गी. १३।२७) ५. (भ. गी. ५।१८) ६. (भ. गी. १८।२०) ७. (भ. गी. ७।१९) ८. (बृ. उ. ४।३।३१) ९. (बृ. उ. २।४।१४, ४।५।१५) १०. (बृ. उ. ४।४।१९, कठ. उ. ४।१०) ११. (छां. उ. ७।२४।१)

  • दाभासते०—पाठान्तरम् ।