उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context२९६ उपदेशसाहस्री नामधेयम् १”, “अनृतम् २”, “अन्योऽसावन्योऽहम् ३” इति भेददर्शननिन्दोपपत्तेरविद्याकृतं द्वैतम्—“एकमेवा- द्वितीयम् ४”, “यत्रत्वस्य ५”, “को मोहः कः शोकः ६” इत्याद्येकत्वविधिश्रुतिभ्यश्चेति ॥४०॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—तब आचार्य को यह कहना चाहिए—'यह जो कुछ देखा या सुना जाता है, वह वस्तुतः अविद्याकृत है, वास्तव में एक ही आत्मा है। वह एक ही आत्मा, अविद्यामयी दृष्टिवाले लोगों को अनेक-सा प्रतीत होता है। जैसे—तिमिर रोग से पीड़ित मनुष्य को अनेक चन्द्र प्रतीत होते हैं। “जहाँ अन्य-सा होता है”, “वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है”, “और जहाँ कुछ अन्य देखता है, अन्य सुनता है अथवा अन्य जानता है, वह अल्प है, और जो अल्प है वह मरणधर्मा है”, “वाणी से आरंभ होनेवाला विकार नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है”, वह अन्य है और मैं अन्य हूँ (जो ऐसा जानता है वह नहीं जानता)” इत्यादि भेद-दृष्टि की निन्दा उपपन्न होने के कारण भी 'द्वैत' अविद्याकृत ही है। तथा “एक ही अद्वितीय”, “जहाँ इसे (सब कुछ आत्मा ही हो गया)”, “वहाँ क्या मोह और क्या शोक” इत्यादि एकत्व का विधान करनेवाली श्रुतियों से भी यही सिद्ध होता है। तात्पर्य यह है कि व्यवहार तो अविद्या का विषय अर्थात् अविद्याजन्य है, इसलिए पारमार्थिक ब्रह्मात्मैक्य के मानने में कोई विरोध नहीं ॥ ४० ॥ यद्येवं, भगवन्, किमर्थं श्रुत्या साध्यसाधनादिभेद उच्यते, उत्पत्तिः प्रलयश्चेति ? ॥४१॥ हृदयस्पर्शिनी यद्येवमिति—शिष्य पूछता है कि हे भगवन् ! यदि ऐसा ही बात है तो साध्य-साधन आदि भेद का तथा उत्पत्ति और प्रलय का वर्णन श्रुति क्यों करती है ? उक्त प्रश्न का अभिप्राय यह है कि यदि साध्य-साधनभेद, अविद्या का विषय है, तो समस्त कर्मकाण्ड मिथ्यार्थगोचर होने के कारण उसे अप्रमाण कहना होगा। द्वैत को मिथ्या मानने पर केवल कर्मकाण्ड ही अप्रमाण नहीं कहलायेगा, अपितु ज्ञानकाण्ड में भी सृष्टि-प्रलयादि के वाक्य निर्विषय हो जायेंगे, उस कारण ज्ञानकाण्ड को भी अप्रमाण कहना पड़ेगा ॥ ४१ ॥ अत्रोच्यते—अविद्यावत उपात्तशरीरादिभेदस्येष्टानिष्टयोगिनमात्मानं मन्यमानस्य साधनै- रेवेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायविवेकमजानत इष्टप्राप्तिं चानिष्टपरिहारं चेच्छतः शनैस्तद्विषयमज्ञानं *निवर्तयत् शास्त्रम्, न साध्यसाधनादिभेदं विधत्ते अनिष्टरूपः संसारो हि स इति। तद्भेददृष्टिमेवाविद्यां संसारमूल- मुन्मूलयति उत्पत्तिप्रलयादि एकत्वोपपत्तिप्रदर्शनेन ॥४२॥ हृदयस्पर्शिनी अत्रेति—वेदान्तवाक्य से उत्पन्न ब्रह्मात्म विज्ञान होने के पूर्व कर्मकाण्ड के अप्रामाण्य की शंका कर रहे हो, या ब्रह्मात्मैकत्वज्ञान के पश्चात् कर्मकाण्ड के अप्रामाण्य की शंका कर रहे हो ? प्रथम पक्ष में—आचार्य कहते हैं कि 'अप्राप्ते शास्त्रम् अर्थवत्' इस न्याय से, कर्तृ-साधन-फलभेदस्वरूप का ज्ञान तो शास्त्रज्ञान से रहित लोगों को भी रहता है, किन्तु उसमें वेद (श्रुति) का तात्पर्य नहीं होता, इसलिये यथाप्रसिद्ध भेद को लेकर ही पुरुष के लिये अविज्ञात पुरुषार्थसाधन का बोध करानेवाले शास्त्र के प्रति अप्रामाण्य की आशंका नहीं की जा सकती—इसी १. (छां. उ. ६।१।४-६, ६।४।१-४) २. (छां. उ. ७।२।१, ७।७।१, तै. उ. २।६ ) ३. (बृ. उ. १।४।१०) ४. (छां. उ. ६।२।१-२) ५. (बृ. उ. ४।५।१५) ६. (ई. उ. ७)
- निवर्तयितुम—पाठान्तरम् ।