उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextकूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरण ३०३ हृदयस्पर्शिनी नन्विति-इस पर शिष्य अपनी भ्रान्त धारणा के वशीभूत होने से मीमांसकादि के मत से पुनः शंका करता है कि जैसे वंश-स्तंभों (बाँस और खंभों) के परस्पर आधाराधेयभावात्मक संयोगविशेष से घर बनता है। और वह, लोगों के 'गृहम्' = यह घर है, इस प्रकार एकशब्दप्रत्यय का विषय होता है, उसी तरह देह और आत्मा के संयोग- विशेष से 'अहं मनुष्यः' = मैं मनुष्य हूँ, इस प्रकार सामानाधिकरण्य व्यवहार होता है, अतः वही आत्मा है। यदि आत्मा और अनात्मा दोनों ही अध्यास के विषय होते हों तो आत्मा की सत्ता ही उपपन्न नहीं हो सकेगी, क्योंकि अध्यस्त पदार्थ तो मिथ्या होता है। जो वस्तु जहाँ अविद्या से अध्यारोपित रहती है, उसे वहाँ असत् देखा गया है। जैसे शुक्ति (सीपी) आदि में रजत (चाँदी), स्थाणु में पुरुष, रज्जु (रस्सी) में साँप, आकाश में तलमालिन्य (नीलिमा, गंधर्वनगरादि) इस प्रकार व्याप्ति बताकर यदि देह और आत्मा का भी सर्वदा ही निरन्तर (व्यवधानशून्य) अभिन्न- प्रतीतिविषयत्वरूप एक दूसरे में अध्यारोप किया गया हो तो वह हमेशा ही उन दोनों की पारस्परिक असत्ता का ही हेतु होगा, इस प्रकार पक्षधर्मता को बता रहा है। अर्थात् व्याप्ति और पक्षधर्मता के सिद्ध होनेपर अनात्मा में आत्मा, और आत्मा में अनात्मा नित्य ही असत् कहा जायगा, क्योंकि वे नित्य ही इतरेतरत्र अध्यस्त हैं। जिस प्रकार शुक्ति आदि में अविद्या से अध्यारोपित रजतादि की सर्वदा ही आत्यन्तिक असत्ता है, तथा इसके विपरीत शुक्तिकादि की तद्विपरीत रजतादि में असत्ता है। इस रीति से प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण-इन तीन अवयवों को बताकर उपनय और निगमन को बता रहे हैं-उसी प्रकार यदि देह और आत्मा का भी अविद्या से ही एक-दूसरे में अध्यास हुआ है तो, उनकी ( देह और आत्मा की ) असत्ता का ही प्रसंग उपस्थित होता है। इस पर बौद्धमत के अनुसार यदि कोई सिद्ध- साध्यत्व की आशंका करे तो उसके निवारणार्थ ग्रन्थकार कह रहे हैं कि “तच्च अनिष्टम्, वैनाशिकपक्षत्वात्” अर्थात् यह आत्मा की असत्ता का पक्ष, वैनाशिक का (बौद्ध का) होने के कारण हमें इष्ट नहीं है। अतः सिद्धसाध्यत्व की आशंका करना उचित नहीं है। और यदि अन्यतराध्यास अर्थात् देह को ही आत्मा में अविद्या से आरोपित कहें तो आत्मा की सत्ता रहते हुए भी देह की असत्ता का प्रसंग उपस्थित होगा, किन्तु वह भी प्रत्यक्षादि प्रमाणों के विरुद्ध होने के कारण अभीष्ट नहीं है। अतः यह मानना होगा कि देह और आत्मा अविद्यावश एक-दूसरे में आरोपित नहीं हैं। तो वे कैसे हैं? ऐसी जिज्ञासा होने पर उन्हें बाँस और खंभे के समान नित्य संयुक्त समझना चाहिये ॥ ५५ ॥ न, अनित्यत्वपरार्थत्वप्रसङ्गात् । संहतत्वात् परार्थत्वमनित्यत्वं च वंशस्तम्भादिवदेव । किंच--यस्तु परैर्देहेन संहतः कल्पित आत्मा, स संहतत्वात्परार्थः । तेनाऽसंहतः परोऽन्यो नित्यः सिद्धस्तावत् ॥५६॥ हृदयस्पर्शिनी नेति-परिशेषात् इतरेतराध्यास को सिद्ध करने के लिये सिद्धान्ती उक्त सम्बन्ध का खण्डन कर रहा है। पूर्वपक्षी (शिष्य) का कथन उचित नहीं है, क्योंकि वैसा स्वीकार करने पर उनके अनित्य और परार्थत्व का प्रसंग उपस्थित होगा। परस्पर संहत (संयुक्त) होने के कारण वंश और स्तंभ के समान ही उनका परार्थत्व और अनित्यत्व मानना होगा। इस प्रकार अनित्यत्व मानने पर संघातवाद की प्राप्ति होगी, अर्थात् अनेक तत्त्वों से मिल कर आत्मा बना है, यह मानना होगा। और परार्थ मानने पर आत्मा को अचेतन स्वीकार करना पड़ेगा, क्योंकि जो वस्तु परार्थ होती है, वह परप्रकाश्य भी होती है। किञ्च अन्यमतावलंबी जिस आत्मा को देह से संहत कहते हैं, वह संहत होने के कारण परार्थ हो जाता है। अतः परार्थ (अनित्य) संघात रूप देह से भिन्न जो आत्मा है, वह दूसरा ही है और वह नित्य ही है, यह सिद्ध होता है। उसके अतिरिक्त सब अनित्य है। अनुमान का आकार यह होगा-‘विमतो देहः स्वविलक्षणशेषः संहतत्वात् गृहवत्' ।। ५६ ।। तस्यासंहतस्य देहे देहमात्रतयाऽध्यारोपितत्वेनासत्त्वाऽनित्यत्वादिदोषप्रङ्गो न भवति। ननु तत्र निरात्मको देह इति वैनाशिकपक्षप्राप्तिदोषः स्यात् ॥५७॥