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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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३०४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पशिंनी तस्येति—शिष्य कहता है कि संघातात्मक अचेतन से अन्य आत्मा है, यह जो आपने कहा वह ठीक है, किन्तु उसका यदि शरीरादि संहत पदार्थ के साथ कोई संबन्ध न हो तो 'मैं मनुष्य हूँ' यह व्यवहार नहीं बन सकेगा, अतः आत्मा में अध्यस्त देहादि के साथ उस आत्मा का तादात्म्य संबन्ध माना जाय । अर्थात् उस असंहत संघातसाक्षी आत्मा का अपने में अध्यस्त देह में देहरूप से अध्यास होता है। ऐसा मानने पर भी उसके (आत्मा के) असत्त्व, अनित्यत्वादि के दोष की आपत्ति होगी । तब 'अध्यस्त पदार्थ मिथ्या होता है'—इस नियम के अनुसार 'देह, आत्म- शून्य है' इस प्रकार वैनाशिक के 'शून्यवाद' पक्ष की प्राप्ति होगी ॥ ५७ ॥ न। स्वत एवात्मन आकाशस्येवासंहतत्वाभ्युपगमात्। सर्वेणासंहतः स चात्मेति न निरात्मको देहादिः सर्वः स्यात्। यथा चाकाशं सर्वेणासंहतमिति सर्वं न निराकाशं भवति, एवम्। तस्मान्न वैनाशिकपक्षप्राप्तिदोषः स्यात् ॥५८॥ हृदयस्पशिंनी नेति—गुरुदेव कहते हैं कि तुम्हारा कथन उचित नहीं है, क्योंकि आत्मा का असंहतत्व, आकाश के समान स्वाभाविक माना गया है। यह आत्मा सभी से असंहत है, ऐसा कहने पर देहादि समस्त पदार्थ निरात्मक भी सिद्ध नहीं होते । जैसे आकाश सबसे असंहत है, इसलिये सब वस्तु, आकाशहीन सिद्ध नहीं होती। इसलिये यहाँ वैनाशिक पक्ष की प्राप्ति का दोष उपस्थित नहीं होता। अभिप्राय यह है कि देहादि पदार्थ रूपादिमान् या सावयव होने के कारण यद्यपि घट-पटादि के समान जड़ हैं, तथापि अपने से विलक्षण चेतनरूप प्रतीत होते हैं। अतः तप्त लोहपिण्ड के समान उसका चेतन आत्मा से संश्लेष (संबंध) कहना चाहिये। तथा उस संघातसाक्षी, चिन्मात्रस्वभाव निरवयव आत्मा में आकाश के समान स्वतःपरिच्छेद एवं अशुद्धि आदि दोषों का संभव न होने के कारण देह के संश्लेष से ही देह में उसका प्रतिभास होता है। इस प्रकार एक दूसरे के धर्मों का संसर्ग होने से अनुभव के अनुसार ही उनका एक-दूसरे में अध्यास सिद्ध होता है। उसी कारण देह में चेतनत्व और आत्मा में गौरत्व, श्यामत्व आदि धर्मों की प्रतीति होती है। यहाँ यह भूलना न होगा कि निरधिष्ठान आरोप होता हुआ कभी किसी के नहीं देखा है। आरोप- ज्ञान के होने पर स्फुरण होने वाले दो पदार्थों में प्रतीयमान् वस्तु की प्रतीति अन्य वस्तु के उपराग के बिना स्वतंत्रता से कभी नहीं होती, अर्थात् वह तो स्वरूप से ही आरोपित हुआ करती है। जिस प्रकार आकाश से उपरक्त नीलिमा अथवा मरुभूमि से उपरक्त मृगजल की प्रतीति, आकाश और मरुभूमि के बिना कभी नहीं होती, अतः ये स्वरूप से ही अध्यस्त माने जाते हैं। किन्तु इनके विपरीत जिसका केवल संसर्गवश ही अन्य में आरोप होता है, उसे स्वरूप से आरोपित नहीं समझा जाता। जैसे शुक्ति में 'यह रजत है' ऐसा अध्यास होने पर रजत में शुक्ति के इदमंश का जो स्फुरण होता है, वह स्वरूपतः अध्यस्त नहीं है। उसी प्रकार आत्मा का भी सुषुप्ति आदि में देहादि के बिना ही स्वतः स्फुरण होता है। उस कारण वह स्वरूपतः देह में अध्यस्त नहीं है, क्योंकि देहादि का आत्मसत्ता के बिना स्वतः स्फुरण नहीं होता, इसलिये वे स्वरूपतः अध्यस्त हैं। अतः देहादि का निरात्मकत्व (आत्मशून्यत्व) भी सिद्ध नहीं होता, क्योंकि कोई भी अध्यस्त वस्तु बिना अधिष्ठान नहीं हुआ करती। इस कारण बौद्धाभिमत शून्यवाद को युक्तियुक्त नहीं कहा जा सकता। देह, चैतन्याभास से व्याप्त होने के कारण, उसमें चिद्धर्म के अध्यारोप के अधिष्ठान का उपचार किया जाता है। अतः परस्पराध्यास पक्ष में कोई दोष नहीं है। स्वतः असंहत के सर्वत्र सर्वदा विद्यमान रहने से संघात (शरीर) को निरात्मक भी नहीं कहा जा सकेगा। और न आत्मा को अनित्य ही कहना पड़ेगा। अतः कोई दोष नहीं है ॥ ५८ ॥ यत्पुनरुक्तम्--देहस्यात्मन्यसत्त्वे प्रत्यक्षादिविरोधः स्यादिति, तन्न प्रत्यक्षादिभिरात्मनि देहस्य सत्त्वानुपलब्धेः । न ह्यात्मनि--कुण्डे बदरम्, क्षीरे सर्पिः, तिले तैलम्, भित्तौ चित्रमिव च- प्रत्यक्षादिभिर्देह उपलभ्यते । तस्मान्न प्रत्यक्षादिविरोधः ॥५९॥

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