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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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३०८ उपदेशसाहस्री

तं गुरुरुवाच--एवं तर्हि स्वार्थस्त्वं चितिमत्त्वात्, न परेण प्रयुज्यसे । नहि चितिमान् परतन्त्रः परेण प्रयुज्यते, चितिमत्प्रश्रितिमदर्थत्वानुपपत्तेः, समत्वात्, प्रदीपप्रकाशयोरिव नाप्यचितिमदर्थत्वं चितिमतो भवति, चितिमतोऽचितिमत्त्वादेव स्वार्थसम्बन्धानुपपत्तेः नाप्यचितिमतो रन्योन्यार्थत्वं दृष्टम् । नहि काष्ठकुड्ये अन्योन्यार्थं कुरुतः ॥७१॥

हृदयस्पर्शिनी तमिति - तब उस शिष्य से गुरु बोले - इस प्रकार यदि तुम अपने को संघात से भिन्न समझते हो तो तुम स्वार्थ (स्वयं अपने लिए) ही हो, और चेतन होने के कारण तुम किसी अन्य (चेतन) से प्रयुक्त नहीं होते हो । क्योंकि कोई भी चेतन (चितिमान्) परतन्त्र होकर किसी दूसरे (चेतन) के द्वारा प्रयुक्त नहीं किया जाता । क्योंकि दीपक और प्रकाश के समान वे दोनों चेतन तुल्य होने के कारण किसी चेतन का किसी दूसरे चेतन के लिए होना संभव नहीं है । और न ही चेतन का किसी अचेतन के लिए होना संभव है । और अचेतन होने के कारण अचेतन का स्वार्थसंबंध होना भी संभव नहीं है, एवं न ही किसी अचेतन को किसी अन्य अचेतन के लिए देखा गया है, अर्थात् अचेतन पदार्थ परस्पर एक दूसरे के लिए नहीं होते हैं । जैसे काष्ठ और भित्ति एक दूसरे का कार्य नहीं किया करते ॥ ७१ ॥

ननु चितिमत्त्वे समेऽपि भृत्यस्वामिनोरन्योन्यार्थत्वं दृष्टम् ॥७२॥

हृदयस्पर्शिनी नन्विति - इस पर शिष्य पुनः शंका करता है - दो चेतनों में चेतनता की समानता रहने पर भी स्वामी और सेवक को एक दूसरे के लिए देखा जाता है ॥ ७२ ॥

नैवम्, अग्नेरुष्णप्रकाशवत्तव चितिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात् । प्रदर्शितश्च दृष्टान्तः प्रदीप- प्रकाशयोरिवेति । तत्रैवं सति, स्वबुद्ध्यारूढमेव सर्वमुपलभसे अग्न्युष्णप्रकाशतुल्येन कूटस्थनित्यचैतन्य- स्वरूपेण । यदि चैवमात्मनः सर्वदा निर्विशेषत्वमुपगच्छसि, किमित्यूचिवान् सुषुप्ते विश्रम्य विश्रम्य जाग्रत्स्वप्नयोर्दुःखमनुभवामि, किमयमेव मम स्वभावः, किंवा *न ? इति च किमसौ व्यामोहोऽपगतः किंवा न ? ॥७३॥

हृदयस्पर्शिनी नैवमिति - गुरु कहते हैं कि जैसा तुम समझ रहे हो, वैसा नहीं है । तुम्हारा चैतन्य, अग्नि के उष्णत्व और प्रकाश के समान है, यह बताना हम चाह रहे हैं । अतएव इस विषय में दीपक और प्रकाश का दृष्टान्त भी हमने प्रदर्शित किया था। ऐसा होने के कारण ही अग्नि के उष्णत्व, प्रकाश के तुल्य तुम अपने कूटस्थ नित्य चैतन्यस्वरूप से ही अपनी बुद्धि पर आरूढ हुए सभी पदार्थों का अनुभव करते हो । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार दीपक अपने प्रकाश से व्याप्त हुए पदार्थों (वस्तुओं) को अपने स्वभाव (स्वरूप) से ही प्रकाशित कर देता है । उन्हें प्रकाशित करने के लिए उसे कोई किसी प्रकार का व्यापार नहीं करना पड़ता है । अतः स्वामिचैतन्य का उपकारक सेवक का शरीर- रूप अचेतन अंश (भाग) ही है, उसका 'आत्मा' नहीं । उसी प्रकार सेवक के चैतन्यभाग का उपकारक भी स्वामी का शरीररूप अचेतन भाग ही है, स्वामी का चैतन्य नहीं । उन दोनों के चेतन भाग, एक-दूसरे के अचेतन भागों द्वारा किए हुए उपकारों के केवल प्रकाशकमात्र हैं । इस प्रकार यदि तुम आत्मा के नित्य निर्विशेषत्व को जान गये हो तो 'मैं सुषुप्ति में विश्राम ले-ले कर जाग्रत् और स्वप्नावस्था में बार-बार दुःख का अनुभव करता हूँ, क्या यह मेरा स्वभाव ही है, अथवा किसी निमित्त से (नैमित्तिक) है ? - ऐसा तुमने क्यों कहा था ? अब तुम्हारा यह व्यामोह दूर हुआ या नहीं ? अब तुम अपने को मैं नित्यमुक्त हूँ, मैं संघाताध्यासकर्ता नहीं हूँ, मुझे संघातधर्मसंसर्ग भी नहीं है, ऐसा समझो और स्वस्थ हो जाओ ॥ ७३ ॥

  • नैमित्तिकः - पाठान्तरम् ।