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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरणम् ३०९ इत्युक्तः शिष्य उवाच--भगवन्, अपगतस्त्वत्प्रसादाद्व्यामोहः, किंतु मम कूटस्थतायां संशयः । कथम् ? शब्दादीनां स्वतः सिद्धिर्नास्ति, अचेतनत्वात्, शब्दाद्याकारप्रत्ययोत्पत्तेस्तु तेषाम् प्रत्ययानामितरेतरव्यावृत्तविशेषाणां नीलपीताद्याकार*त्वस्य स्वतः सिद्धयसंभवात् । तस्माद्वाह्याकार- निमित्तत्वं गम्यत इति बाह्याकारवच्छब्दादिसिद्धिः । तथा प्रत्ययानामप्यहंप्रत्ययालम्बनवस्तुभेदानां संहतत्वाच्चैतन्नोपपत्तेः । स्वार्थत्वासंभवात् स्वरूपव्यतिरिक्तग्राहकग्राह्यत्वेन सिद्धिः, शब्दादिवदेव । असंहतत्वे सति चैतन्यात्मकत्वात्स्वार्थोऽप्यहंप्रत्ययानां नीलपीताद्याकाराणामुपलब्धेति विक्रियावानेव, कथं कूटस्थः ?--इति संशयः ॥७४॥ हृदयस्पर्शिनी इत्युक्त इति—इस प्रकार गुरु के समझाने पर शिष्य बोला—भगवन् ! आपके अनुग्रह से मेरा मोह दूर हो गया । तथापि मुझे अपनी कूटस्थता के विषय में सन्देह है । 'कूट' का अर्थ 'निहाई' है । स्वर्णकार या लुहार जिस पर रखकर कोई चीज गढ़ा करते हैं, उस पर कितनी ही चोट करने पर भी उसमें किसी प्रकार का विकार नहीं होता, वह निर्विकार ही रहता है। उसी प्रकार यह आत्मा भी निर्विकार है । अतएव उसे 'कूटस्थ' कहा जाता है। उसकी कूटस्थता में तुम्हें सन्देह क्यों हो रहा है ? 'शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि विषय तो अचेतन हैं, उस कारण उनकी स्वतः सिद्धि (स्वतः स्फुरण) नहीं हो सकती । शब्दादि की सिद्धि (स्फूति) तो शब्दाद्याकाररूप ज्ञान की उत्पत्ति से ही होती है । शब्दादिकों के आकार, प्रत्ययरूप (ज्ञानरूप) होने से उनकी स्वातिरिक्त ग्राह्यता नहीं है । इस प्रकार विज्ञान- वादी के मत से उसने यह आशंका की है । उसका निराकरण गुरु कर रहे हैं कि जिनके विशेषण एक-दूसरे से पृथक् हैं, ऐसे जो नील-पीतादि आकार के ज्ञान हैं, उनकी भी स्वतः सिद्धि होना संभव नहीं है । इसलिए उनका भी बाह्या- कारनिमित्तक होना सिद्ध होता है । क्योंकि ज्ञान (प्रत्यय) प्रकाशस्वरूप होने के कारण परोपराग के बिना उनकी नील- पीताद्याकारवत्ता अपने आप भी असंभव है । अतः शब्दादिकों का प्रत्ययमात्र (ज्ञानमात्र) स्वरूप नहीं है। इस कथन से बाह्य आकारों के समान शब्दादि के आकारत्व की भी सिद्धि हो जाती है। चैतन्य से पृथक् आकारवाले पराग्व्यवहारयोग्य जो शब्द-स्पर्शादि विषय हैं, उनके द्वारा प्रत्ययों का आकार होने से उन प्रत्ययों की सिद्धि होती है, स्वतः नहीं । इस प्रकार शब्दादि विषयों को यदि तुम स्व-व्यतिरिक्त प्रत्ययग्राह्य समझते हो तो प्रत्ययस्वरूप में विशेषाभाव की सिद्धि होने से उसमें कूटस्थता की सिद्धि होती है, ऐसी आशंका यदि हो तो उसका समाधान यह है कि विषयसंसृष्ट होकर भासमान विषयाकार प्रत्यय आगमापायी होने से स्वप्रकाश चैतन्यरूप नहीं होते हैं, किन्तु अन्य- साक्षिक ही होते हैं । उनका स्वरूपविशेष इस प्रकार का होता है—अहं प्रत्यय की आलम्बनभूत वस्तु (अन्तःकरण) के भेदरूप शब्दादि ज्ञान भी संहत होने के कारण अचेतन हैं। ऐसी स्थिति में उनका स्वार्थत्व संभव न होने के कारण शब्दादि के समान उनकी सिद्धि भी अपने स्वरूप से भिन्न ग्राहक के द्वारा ग्राह्य रूप से ही हो सकती है । इसलिए असंहत होने के कारण स्वार्थ रहने पर भी आत्मा चेतनस्वरूप होने से अन्तःकरण की नील-पीतादिरूप वृत्तियों को प्राप्त करता है । अतः वह विकारी ही है, वह कूटस्थ कैसे हो सकता है ? यही मुझे सन्देह है । निष्कर्ष यह है कि शब्द- स्पर्शादि विषय तो अचेतन हैं । इसलिए उनका स्फुरण तदाकार ज्ञान के ही अधीन है। जैसे प्रकाशशून्य घटादि पदार्थ, प्रकाश से व्याप्त होने पर ही अवगत हुआ करते हैं, वैसे ही शब्दादि विषयों का ज्ञान भी अन्तःकरणवृत्ति के तदाकार होने पर ही होता है। इस कथन से विज्ञानवादी बौद्ध के इस मत का भी खण्डन हो जाता है कि 'बाह्य पदार्थ कोई नहीं है । यह जो कुछ भी प्रतीत होता है, वह सब विज्ञान का ही परिणाम है' । बाह्य पदार्थों की असत्ता को यदि स्वीकार करते हैं तो वृत्तियों के नील-पीतादि भेद का क्या कारण बताओगे ? दूसरी बात यह भी है कि यदि समस्त पदार्थों को अन्तर ही (ज्ञानाकार ही) मानोगे तो 'अयं नीलः' की जगह 'अहं नीलः' यह कहना होगा । अतः बौद्धों का विज्ञानवाद उचित नहीं है । ये नील-पीतादि ज्ञान भी संहत होने के कारण अचेतन ही हैं । अतः इनको प्रकाशित करनेवाला कोई अन्य ही होना चाहिए । वह अन्य, आत्मा के अतिरिक्त कोई नहीं हो सकता । वह आत्मा, उन विषयों को तदाकार होकर ही प्रकाशित करेगा, तब उसका (आत्मा का) विकारी होना सिद्ध हो जायगा । यह आशंका शिष्य ने की है ॥ ७४ ॥

  • कारवतां, कारवत्तायाः—पाठौ । † ब्दाद्याकारत्व—पाठान्तरम् ।