उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context३१२ उपदेशसाहस्री गुरुवाच—सत्यमेवं स्यात्, यद्युपलब्ध्युपलब्ध्रोर्विशेषः। नित्योपलब्धिमात्र एव ह्युपलब्धा। न तु तार्किकसमय इवान्या उपलब्धिः, अन्य उपलब्धा च ॥७९॥ हृदयस्पर्शिनी गुरुरिति—गुरु बोले—यदि उपलब्धि और उपलब्धा में भेद होता तो तुम्हारी शंका उचित हो सकती थी, किन्तु उपलब्धा तो नित्य उपलब्धिमात्र ही है। 'नित्य' शब्द से क्षणिक विज्ञानवादी बौद्ध का और 'मात्र' शब्द से भेदा- भेदवादी का व्यावर्तन किया गया है। नैयायिक के अनुसार वेदान्त सिद्धान्त में 'उपलब्धि' अन्य हो और 'उपलब्धा' अन्य हो, ऐसा नहीं है। हमारे मत में तो "प्रज्ञानघन एव",$^१$ "प्रज्ञानं ब्रह्म"$^२$ इत्यादि श्रुतिसिद्ध उपलब्धि(ज्ञान)स्वरूप ही आत्मा है ॥ ७९ ॥ ननूपलब्धिफलावसानो धात्वर्थः कथमिति ? ॥८०॥ हृदयस्पर्शिनी नन्विति—इस पर शिष्य ने पूछा कि 'उपलब्धि' शब्द का धात्वर्थ उपलब्धिरूप फलपर्यन्त आपने बताया, वह कैसे उपपन्न होगा ? ॥ ८० ॥ उच्यते---शृणु। उपलब्ध्याभासफलावसान इत्युक्तम्। किं न श्रुतं तत्त्वया ? न त्वात्मा विक्रियोत्पादनावसान इति मयोक्तम् ॥८१॥ हृदयस्पर्शिनी उच्यत इति—गुरु ने कहा—सुनो, क्या तुमने यह नहीं सुना कि उपलब्धि के आभासात्मक फल तक ही इसका धात्वर्थ है, यह मैंने कहा था। आत्मा, विकारोत्पत्तिरूप फल तक है, ऐसे मैंने नहीं कहा था। उपलब्धि तो आत्मा का स्वरूप ही है। यदि वह उसका फल या गुण होती तो वह अनित्य होती, उस अवस्था में आत्मा की कूटस्थता सिद्ध नहीं हो सकती थी। परन्तु वास्तविकता इस प्रकार नहीं है। 'उपलब्धि' तो आत्मा का स्वरूप ही है। बुद्धि में उस स्वरूप- चैतन्य के प्रतिबिम्बित होने से बुद्धि चैतन्यवत् प्रतीत होती है। बुद्धि में प्रतिबिम्बित हुए उस चैतन्य को 'चिदाभास' के नाम से कहते हैं। वही बुद्धिवृत्तियों के परिणाम का प्रकाशक है। उसी के कारण एक ही अधिकारी चेतन उपाधिवश कर्ता, भोक्ता, विज्ञाता आदि नामों से कहा जाता है, किन्तु वास्तव में वह असंग, कूटस्थ ही है। आविर्भाव-तिरोभाव धर्मवाली अन्तःकरण की वृत्तियाँ होती हैं। उन धर्मों से विशिष्ट होकर ही वृत्तियों का स्फुरण होता है। विषयस्थ चैतन्य के साथ अभेदेन प्रकाशमानवृत्तितत्स्थ आभासाश्रय के रूप में भासित होनेवाले आत्मा को 'प्रमाता' कहते हैं। कर्मेन्द्रियों को अधिष्ठान बनाकर क्रियावत्प्राणप्रधान अन्तःकरणलिङ्गत आभास का विवेक न होने से वही 'कर्ता' कहा जाता है। शुभाशुभकर्मोपस्थापित-अन्तःकरण-परिणामविशेष को अविवेक के कारण अपना ही समझनेवाला आत्मा 'भोक्ता' कहा जाता है। इन सभी चित्तविलासावस्थाओं को स्वरूपचैतन्य का अनुगम करने मात्र से साक्षात् अवभासित कराता हुआ-सा, भासित होनेवाला, अलुप्तप्रकाश, असन्दिग्ध, अविपर्यस्त, अविषय साक्षी को 'उपलब्धा', 'साक्षी', 'ज्ञाता' कहा जाता है। वृत्ति का विनाश होने से तद्गत चिदाभास का भी विलय होता है, किन्तु उसका संस्कार रहने पर, कालान्तर में पूर्वावगत विषयाकार स्मृतिवृत्ति का जब उदय होता है, तब तद्गत आभास द्वारा उसी को 'स्मर्ता' कहते हैं। समस्त कार्य-कारणप्रपञ्चोपलक्षित उसी चिदात्मा को तदनुवृत्त सत्ता के अभेद रूप में 'सर्वाधिष्ठान' कहते हैं। कारणोपाधि के अविवेक से और अलुप्त ज्ञानशक्तित्व के रहने से वही 'अन्तर्यामी' आदि शब्दों का वाच्य होता है। सबका तात्पर्य यह है कि किसी न किसी उपाधि के कारण कहीं-कहीं वैसा-वैसा व्यवहार होने से अविद्यावशात् वैसा भासमान होता हुआ भी आत्मा स्वरूपतः निर्विकार, निर्धर्मक, असंग और कूटस्थ ही है ॥ ८१ ॥ १. (बृ. उ. ४।५।१३) २. (ऐ. उ. ५।३)