उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextकूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरणं ३१३ शिष्य उवाच--कथं तर्हि कूटस्थे मय्यशेषस्वविषयचित्तप्रचारोपलब्धृत्वमित्यात्थ ? ॥८२॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य इति-तब शिष्य बोला कि आपने यह क्यों कहा था कि मुझ कूटस्थ में अपने चित्त की समस्त वृत्तियों का उपलब्धृत्व अर्थात् उपलब्धंकर्तृत्व है ॥ ८२ ॥ तं गुरुराह--सत्यमेवावोचम् तेनैव कूटस्थतामवोचं* तव ॥८३॥ हृदयस्पर्शिनी तमिति-उसपर गुरु ने कहा कि मैंने सत्य कहा था । उसी के द्वारा मैंने तुम्हारी कूटस्थता को भी तुम्हें बताया था ॥ ८३ ॥ यद्येवं भगवन्, कूटस्थनित्योपलब्धिस्वरूपे मयि शब्दाद्याकारबौद्धप्रत्ययेषु च मत्स्वरूपोप- लब्ध्याभासफलावसानवत्सूत्पद्यमानेषु कस्त्वपराधो मम ? ॥८४॥ हृदयस्पर्शिनी यद्येवमिति-आत्मा की अशेष स्वगत विशेषताओं के नित्य निवृत्त रहने से उसकी कूटस्थता का ज्ञान होनेपर अपने स्वरूप को वह जान गया, तथापि अपने आपको यह जो भ्रान्ति हुई, उसका बीज (कारण) समझ में न आने से वह पुनः पूछने लगा। यदि मैं नित्य उपलब्धिरवरूप हूँ, और सम्पूर्ण बौद्ध प्रत्यय मेरे ही आभास से प्रकाशित होते हैं तो इन शब्दादि विषयों के ज्ञानों का ग्रहीता होने में मेरा क्या अपराध है ? इस अभिप्राय से शिष्य कहता है कि भगवन् ! यदि ऐसी बात है तो कूटस्थ नित्योपलब्धिस्वरूप मुझ में मेरी स्वरूपभूता उपलब्धि के आभासरूप फल में पर्यवसित होनेवाले शब्दादिरूप बौद्धज्ञानों के उत्पन्न होने में मेरा क्या अपराध है? अर्थात् उनका ग्रहीता होने के कारण मैं तो विकारी ही सिद्ध हो रहा हूँ ॥ ८४ ॥ सत्यम् नास्त्यपराधः, किन्त्वविद्यामात्रस्त्वपराध इति प्रागेवावोचम् ॥८५॥ हृदयस्पर्शिनी सत्यमिति-गुरु ने कहा कि सत्य है, तुमने अपने अनुभव को नहीं छिपाया, इसलिये तुम्हारा अपराध नहीं है । किन्तु अविद्यामात्र तो अपराध है ही, ऐसा मैं पहले ही कह चुका हूँ ॥ ८५ ॥ यदि, भगवन्, सुषुप्त इव मम विक्रिया नास्ति, कथं स्वप्नजागरिते ॥८६॥ हृदयस्पर्शिनी यदीति-शिष्य कहता है, भगवन् ! सुषुप्तावस्था के समान यदि मुझ में विकार है ही नहीं, तो मुझे स्वप्न और जागरित अवस्था कैसे प्राप्त होती हैं ? ॥ ८६ ॥ तं गुरुराह--किंत्वनुभूयेते त्वया ⁺सन्ततम् ॥८७॥ हृदयस्पर्शिनी तं गुरुरिति-तब गुरु ने उससे कहा-किन्तु इन अवस्थाओं का तुम्हारे द्वारा सतत अनुभव तो किया जा रहा है। अर्थात् क्या तुम उन अवस्थाओं का सतत अनुभव नहीं करते हो ? वे अवस्थाएं तो तुम्हारे चैतन्य से प्रकाश्य हैं, वे तुम्हारी स्वाभावरूप नहीं हैं ॥ ८७ ॥ शिष्य उवाच--बाढमनुभवामि, किंतु विच्छिद्य-विच्छिद्य, न तु सन्ततम् ॥८८॥
- मब्रूवम्-पाठान्तरम् । † सततम्-पाठान्तरम् । ४०