उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context३१४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी शिष्य इति—इस पर शिष्य कहता है—हाँ, अनुभव तो करता हूँ, किन्तु रुक-रुक कर (व्यवधान से) अनुभव करता हूँ, सतत नहीं ॥ ८८ ॥ गुरुराह—तर्हि आगन्तुके त्वेते, न त्वात्मभूते । यदि त्वात्मभूते, चैतन्यस्वरूपवत्स्वतः सिद्धे सन्तते एव स्याताम् । किंच, स्वप्नजागरिते न त्वात्मभूते, व्यभिचारित्वात्, वस्त्रादिवत् । न हि यस्य यस्य यत्स्वरूपं, तत्तद्व्यभिचारि दृष्टम् । स्वप्नजागरिते तु चैतन्यमात्रत्वात् व्यभिचरतः । सुषुप्ते चेत्स्वरूपं व्यभिचरेत् तन्नष्टं, नास्तीति बाध्यं वा स्यात्—आगन्तुकानामतद्धर्माणामुभयात्मकत्वदर्शनात्— यथा धनवस्त्रादीनां नाशो दृष्टः, स्वप्नभ्रान्तिलब्धानां त्वभावो दृष्टः ॥८९॥ हृदयस्पर्शिनी गुरुरिति—गुरु ने उससे कहा—तब तो अवस्थाएँ आगन्तुक ही हैं। सुषुप्ति में आत्मस्वरूप के भासमान होने पर भी स्वप्न-जागरित का अवभास नहीं होता । अतः वे दोनों अवस्थाएँ आत्मा की स्वरूपभूत नहीं हैं। इसी कारण उनका अनुभव तुम्हें विच्छिद्य-विच्छिद्य (रुक-रुककर) होता है । यदि वे तुम्हारी स्वरूपभूत होतीं अर्थात् स्वतः सिद्ध होतीं तो वे निरन्तर अनुभूत होती रहतीं । अतः अनुमान प्रमाण से अवगत होता है कि 'विमते अवस्थे अनात्मभूते व्यभिचारित्वात् वस्त्रादिवत्' अर्थात् वस्त्रादि के समान आगमापायिनी (व्यभिचारिणी) होने के कारण स्वप्न और जाग्रत् अवस्थाएँ आत्मा की स्वरूपभूता नहीं हैं क्योंकि जो जिसका स्वरूप होता है, वह उससे व्यभिचारी (पृथक् रहनेवाला) नहीं देखा गया है। किन्तु स्वप्न और जाग्रत् का तो चैतन्यस्वरूप आत्मा से व्यभिचार (विच्छेद) होता है। यदि सुषुप्ति अवस्था में स्वरूप का व्यभिचार माना जाय तो वह या तो नष्ट हो जाता है या है ही नहीं, इसलिये उसका बाध ही हो जाता है, क्योंकि वस्तु में न रहने वाले आगन्तुक धर्म दो ही प्रकार के देखे जाते हैं। जैसे धन, वस्त्र आदि का तो नाश देखा जाता है, और स्वप्न एवं भ्रान्ति से प्राप्त हुए पदार्थों का सर्वथा अभाव देखा गया है ॥ ८९ ॥ नन्वेवं, भगवन्, चैतन्यस्वरूपमप्यागन्तुकं प्राप्तम्, स्वप्नजागरितयोरिव सुषुप्तेऽनुपलब्धेः, अचैतन्यस्वरूपो वा स्यामहम् ॥९०॥ हृदयस्पर्शिनी नन्विति—शिष्य कहता है—हे भगवन् ! इस प्रकार से तो आत्मा का चैतन्यस्वरूप भी आगन्तुक सिद्ध होता है, क्योंकि स्वप्न और जाग्रत् के तुल्य सुषुप्ति में उसकी उपलब्धि नहीं होती। अथवा मुझमें अचैतन्यस्वरूपता की भी प्राप्ति हो सकती है—क्योंकि अन्य कोई गति नहीं है ॥ ९० ॥ न, पश्य । तदनुपपत्तेः । चैतन्यस्वरूपं चेदागन्तुकं पश्यसि, पश्य, नैतद्वर्षशतेनाप्युपपत्त्या कल्पयितुं* शक्नुमो वयम्, अन्यो वाऽचैतन्योऽपि; तस्य संहतत्वात्पारार्थ्यमनेकत्वं नाशित्वं च न केनचि- दुपपत्त्या वारयितुं शक्यम्—अस्वार्थस्य स्वतःसिद्धयभावादित्यवोचाम । चैतन्यस्वरूपस्य त्वात्मनः स्वतः सिद्धेरन्यानपेक्षत्वं न केनचिद्वारयितुं शक्यम्, अव्यभिचारात् ॥९१॥ हृदयस्पर्शिनी नेति—गुरु ने कहा कि नहीं; देखो, ऐसा कहना उचित नहीं है। अर्थात् वस्तुस्वभाव का आलोचन करने पर चैतन्य की आगन्तुकता अनुपपन्न ठहरती है इसलिये तुम्हारा कहना उचित प्रतीत नहीं हो रहा है। इस पर शिष्य कहता है कि सुषुप्ति में दृष्टि(ज्ञान)रूप चैतन्य का अनुभव नहीं होता परन्तु जाग्रत् आदि अवस्थाओं में उसका अनुभव होता है। अतः चैतन्य भी आगन्तुक ही है, ऐसा मैं सोच रहा हूँ। उस पर गुरु ने उससे पूछा कि यह बताओ कि क्या तुम निरुपाधिक चित्स्वरूप (चैतन्यस्वरूप) को ही आगन्तुक कह रहे हो अथवा नेत्रादिद्वारक बुद्धिवृत्ति से उपहित हुए
- कल्पयितुं—पाठान्तरम् ।