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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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कूटस्थाद्वयात्मबोधप्रकरणम् ३२३ हृदयस्पर्शिनी यद्येवमिति-इस प्रकार अब आत्मा और अनात्मा के यथार्थ स्वरूप को समझकर वह शिष्य, अवगत किये अर्थ को गुरु के प्रति निवेदन करता हुआ आत्मा के अद्वैतत्व को संभावित करने के लिए द्वैत के मृषात्व को प्रकट कर रहा है। शिष्य निवेदन करता है कि हे भगवन् ! यदि ऐसी बात है तो कूटस्थ, नित्य अवगति (ज्ञान) स्वयंप्रकाश- स्वरूप और स्वयं सिद्ध ही है, क्योंकि आत्मा में अन्य किसी प्रमाण की अपेक्षा नहीं है। और उससे जो भिन्न है, वह अचेतन और मिलकर कार्यकारी होने से परार्थ है अर्थात् चेतनार्थ (चेतन के लिये) है। चैतन्य के प्रतिभासमात्र से उसकी सिद्धि होने से स्वप्नदृष्ट की तरह वह अनृत (मिथ्या) है। इसपर सांख्यवादी शंका करता है कि जितना भी दृश्य है, वह सब सुख-दुःख-मोहान्वयी रहता है, अतः वह सत्त्व-रजस्तमोरूप प्रकृति का कार्य है, यह स्पष्ट प्रतीत होता है। ऐसी स्थिति में उसे अनृत (मिथ्या) कैसे समझा जाय ? गुरु समाधान करते हैं कि जिस सुख, दुःख और मोह अर्थात् सत्त्व-रजस्तमोहेतुक प्रत्ययावगतिरूप से जड़ वस्तु, परार्थ (भोक्तृशेषवत्) प्रतीत होती है, उसी रूप से उस जड़ वस्तु (दृश्य वस्तु) की सत्ता (अस्तित्व) भी है, किसी अन्य रूप से (सत्त्वादि रूप से) नहीं है। क्योंकि उसमें कोई प्रमाण नहीं है। अतः परमार्थतः उसकी (जड़ वस्तु की) सत्ता ही नहीं है। किञ्च-जिस प्रकार लोकव्यवहार में रज्जु-सर्प एवं मृगमरीचिका आदि की प्रतीति के अतिरिक्त उनका अभाव ही दृष्टिगोचर होता है। इसी को हम अनुमान के आकार में इस प्रकार कह सकते हैं— 'विमतं जाग्रत्स्वप्नावस्थं दृश्यं नावगतिव्यतिरेकेण क्वचिदपि परमार्थसत्, दृश्यत्वाज्जडत्वाद्वा, रज्जुसर्पादिवत्' । इस प्रकार दृश्य पदार्थ सापेक्ष होने से उसके मायामय होने की सम्भावना है, अतः द्रष्टृत्व ही अद्वैत है, वही मेरे अनुभव में अब आरूढ़ हो गया है। इसी का अब निरन्तर अनुभव हो रहा है। जाग्रत् और स्वप्नावस्था के द्वैतरूप दृश्य का उसकी प्रतीति के अतिरिक्त परमार्थतः अभाव ही युक्तियुक्त प्रतीत हो रहा है। उसी प्रकार हे भगवन् ! अवगतिरूप प्रत्यक् प्रकाश की कूटस्थ नित्यता और अद्वैत भाव का मेरे द्वारा अनुभव किया जा रहा है। वह स्वयंप्रकाश अवगति निरन्तर वर्तमान रहती है, उस कारण वह कूटस्था, नित्या और द्वैतरहिता है। क्योंकि समस्त प्रत्ययभेदों में उसका अव्यभिचार है। किन्तु प्रत्यय भेदों का अपनी अवगति में व्यभिचार रहता है। जिस प्रकार स्वप्नावस्था में नील-पीताद्याकार भेदरूप प्रत्ययों का परस्पर अपनी अवगति में व्यभिचार होने के कारण 'वे परमार्थतः नहीं हैं' ऐसा कहा जाता है, उसी प्रकार जाग्रदवस्था में भी नील-पीतादि प्रत्ययभेदों का उस अवगति में व्यभिचार होने से वे असत्यरूप ही होने चाहिए। इसी को हम अनुमान के आकार में इस प्रकार कह सकते हैं—'विमता जाग्रत्प्रत्ययाः परमार्थतो न विद्यन्ते, चैतन्यप्रकाशव्यभिचारित्वात्, ये एवं, ते एवं, यथा स्वप्नप्रत्ययाः तथा चेमे, तस्मात्तथा' । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार स्वप्नावस्था में देखते हैं कि नीलाकार ज्ञान में पीताकार ज्ञान नहीं रहता, तथा पीताकार ज्ञान में नीलाकार ज्ञान नहीं रहता किन्तु ज्ञान उन सभी में रहता है, केवल उसकी उपाधि का व्यभिचार होता है। उसी प्रकार जाग्रत् ज्ञान में भी है। इसलिए आपस में व्यभिचारी होने के कारण जिस प्रकार वे स्वप्न में मिथ्या हैं, उसी प्रकार जाग्रत् में भी हैं। इतना ही नहीं, संपूर्ण स्वप्नावस्था का जाग्रत् अवस्था में और जाग्रत् अवस्था का स्वप्नावस्था में भी व्यभिचार है। इससे भी उनका मिथ्यात्व स्पष्ट हो जाता है। किन्तु उनके साक्षी का किसी भी अवस्था में व्यभिचार नहीं दिखाई देता। इस कारण परमार्थतः वही कूटस्थ, नित्य, सद्वस्तु है। क्योंकि जो परमार्थतः सत्य हो अर्थात् जिसका किसी काल में भी अभाव न हो, उसी को 'वस्तु' शब्द से कहना उचित है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा है— “नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥” (२।१५) सद्वस्तु से विलक्षण असद्रूप इस जगत् की सत्ता (अस्तित्व) नहीं हो सकती और सत्स्वरूप ब्रह्म की असत्ता (अभाव) नहीं हो सकती, इस प्रकार तत्त्वदर्शियों ने सत् और असत् के विषय में निश्चय किया है। स्वप्न, जाग्रत् आदि अवस्थाओं में होने वाली अवगति का कोई अन्य ज्ञाता नहीं है। उस कारण अन्य वस्तु का अभाव होने के कारण अपने स्वरूप से उसका न तो ग्रहण ही किया जा सकता है और न त्याग ही किया जा सकता है। अवगन्ता (ज्ञाता) के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु के न होने के कारण 'मैं पूर्ण हूँ' यह अनुभव आपके प्रसाद से अब हो रहा है॥ १०९॥