उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context३२४ उपदेशसाहस्री तथैवेति। एषाऽविद्या, यन्निमित्तः संसारो जाग्रत्स्वप्नलक्षणः। तस्या अविद्याया विद्या निवर्तिका। इत्येवं त्वमभयं प्राप्तोऽसि*। नातः परं जाग्रत्स्वप्नदुःखमनुभविष्यसि। संसारदुःखात् मुक्तोऽसीति ॥११०॥ हृदयस्पर्शिनी तथैवेति—इस प्रकार से जब शिष्य ने कहा तब गुरु उसकी बात का समर्थन कर रहे हैं। प्रकरण के प्रारम्भ में शिष्य ने विद्या और अविद्या का स्वरूप, उसका विभाग पूछा था, उसे विस्तार के साथ बता चुके हैं। अब प्रकरण का उपसंहार करने जा रहे हैं। गुरु ने शिष्य से कहा कि अब जो तुम्हें अपनी पूर्णता का अनुभव हो रहा है, वह ठीक ही हो रहा है। जिसके कारण जाग्रत्-स्वप्नरूप संसार की प्रतीति होती है, वह तो 'अविद्या' है अर्थात् 'अज्ञान' है। और वेदान्तमहावाक्यजन्य प्रत्यय से अभिव्यक्त होनेवाला कूटस्थ जो आत्मप्रकाश है, वह 'विद्या' है। पूर्वोक्त उस अज्ञान (अविद्या) की निवृत्ति करनेवाला ज्ञान (विद्या) ही है। अब तुम्हें विद्या (ज्ञान) प्राप्त हो गया है। इसलिए अब तुमने अभय प्राप्त कर लिया है। अब से भविष्य में तुम जाग्रत्-स्वप्नजन्य दुःख का अनुभव नहीं करोगे। तुम अब संसाररूप दुःख से मुक्त हो गये हो। अतः तुम कृतकृत्य हो गये हो ॥ ११० ॥ ओमिति ॥१११॥ हृदयस्पर्शिनी ओमिति—गुरु ने जो कहा उसे शिष्य ने भी 'ॐ' शब्द से स्वीकृति दे दी। अर्थात् आपने जो कहा, वह सत्य है ॥ १११ ॥ ॥ इति द्वितीयम् कूटस्थाद्वयात्मबोधप्रकरणम् समाप्तम् ॥
- प्राप्नोषि—पाठभेदः ।