उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextपरिसंख्यानप्रकरणम् ३२७ शब्द तो मुझे स्पर्श भी नहीं कर सकता, क्योंकि मैं तो संसर्गशून्य ही हूँ। इसीलिये शब्द के कारण मेरी कोई हानि या लाभ नहीं होता। अतः स्तुतिनिन्दादि-प्रियाप्रियत्वादि गुणवाला शब्द, मेरा क्या करेगा ? जो अविवेकी है, उसे ही 'शब्द' आत्मरूप से प्राप्त होता है। अतः अज्ञानी होने के कारण प्रिय शब्द उसे वृद्धिगत कर देता है और अप्रिय शब्द गिरा देता है। यह 'शब्द' तो मुझ विवेकी का बालाग्र के बराबर भी हानि-लाभ नहीं कर सकता। जैसे मुष्टिप्रहार से आकाश की कोई हानि नहीं की जा सकती, उसी प्रकार सामान्य स्पर्श से अथवा शीत, उष्ण, मृदु (कोमल) एवं कठोर आदि स्पर्शविशेष तथा ज्वर, उदरशूलादिरूप अप्रिय और बाह्य आगन्तुक निमित्तों से होने वाले शरीरसंबंधी किन्हीं प्रियाप्रिय स्पर्शों से भी मेरा किसी प्रकार का हानि-लाभरूप विकार नहीं हो सकता। उसी तरह सामान्यरूप से तथा उसके प्रिय एवं अप्रिय स्त्री-व्यञ्जनादि विशेष भेदों द्वारा भी मेरी कोई हानि या लाभ नहीं किया जा सकता। क्योंकि मैं रूपरहित हूँ। तथा सामान्य 'रस' से अथवा मूढ़बुद्धि पुरुषों द्वारा ग्रहण किये जानेवाले उसके मीठे, खट्टे, खारे, कड़वे, चटपटे और कसैले आदि प्रिय और अप्रियरूप विशेष भेदों से भी मुझ अरसात्मक का कोई हानि या लाभ नहीं होता। ऐसे ही 'सामान्य गन्ध' से तथा पुष्प एवं अनुलेपनादिरूप उसके प्रिय या अप्रिय विशेष रूपों से मुझ गन्धहीन का कोई हानि-लाभ नहीं होता, क्योंकि भगवती श्रुति कह रही है कि "अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्"१—जो आत्मा शब्दरहित, स्पर्शरहित, अविनाशी, रसहीन, नित्य, और गन्धरहित है ।। ११५ ।।
किञ्च--य एव बाह्याः शब्दादयः, ते शरीराकारेण संस्थिताः२ तद्ग्राहकैश्च श्रोत्राद्याकारैः, अन्तःकरणद्वयतद्विषयाकारेण३ च, ४अन्योन्यसंसर्गित्वात्संहतत्वाच्च सर्वक्रियासु । तत्रैवं सति विदुषो न मम कश्चिच्छत्रुमित्रमुदासीनो वाऽस्ति । तत्र यदि कश्चित् मिथ्याज्ञानाभिमानेन प्रियमप्रियं वा प्रयुयुङ्क्षेत्५ क्रियाफललक्षणं तन्मृषैव प्रयुयुङ्क्षति६ सः, तस्याविषयत्वान्मम, "अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम्" इति स्मृतेः । तथा सर्वेषां पञ्चानामपि भूतानामविकार्यः, अविषयत्वात्, "अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयम्" इति स्मृतेः । याऽपि शरीरेन्द्रियसंस्थानमात्रमुपलक्ष्य, मद्भक्तानां विपरीतानां च प्रियाप्रियादिप्रयुयुक्षा, तज्जा च धर्मा- धर्मादिप्राप्तिः, तेषामेव, न तु मय्यजरेऽमृतेऽभये । "नैनं कृताकृते तपतः", "न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्", "सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः", "न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः" इत्यादिश्रुतिभ्यः । अनात्मवस्तु- न्यन्चाऽसत्त्वं७ परमो हेतुः । आत्मनश्चाद्वयत्वे८, ९द्वयस्यासत्त्वात्, यानि सर्वाण्युपनिषद्वक्यानि विस्तरशः समीक्षितव्यानि समीक्षितव्यानीति ।।११६।।
हृदयस्पर्शिनी किञ्चेति—इस प्रकार सामान्य-विशेष रूपवाले शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादि विषयों से मेरी न कोई हानि है और न वृद्धि (लाभ) है, अतः से उनसे अनभिभूत हूँ; ऐसा निरन्तर चिन्तन करते रहना चाहिए, यह बताकर अब शब्दादि विषयों से अपने अनभिभव का अनुचिन्तन करने के लिए बता रहे हैं। किञ्च—जो बाह्य शब्दादि शरीराकार में तथा उन शब्दादिकों को ग्रहण करनेवाले श्रोत्रादि के रूप में स्थित हैं, वे ही एक-दूसरे से संश्लिष्ट होने के कारण दो अन्तःकरण (मन और बुद्धि) और उनके विषयरूप से भी परिणत हो गये हैं, क्योंकि वे सभी क्रियाओं में परस्पर मिले रहते हैं। तब ऐसी स्थिति में मुझ विद्वान का कोई भी शत्रु, मित्र या उदासीन नहीं है। अतः यदि मिथ्या ज्ञानाभिमान के कारण कोई पुरुष किसी प्रकार के क्रियाफलरूप प्रिय या अप्रिय का प्रयोग करना चाहता है, तो उसकी यह प्रयोग की इच्छा मिथ्या ही है। क्योंकि "यह अव्यक्त और अचिन्त्य है"१० इस स्मृति के अनुसार मैं तो उसका विषय नहीं हूँ।
१. ( कठ उ. ३।१५ ) ६. प्रयुयुक्षते—पाठभेदः । २. तत्परिणामरूपैः—अधिको पाठः । ७. असत्त्वादिति—पाठभेदः । ३. बुद्धिमन्सी—अधिको पाठः । ८. अद्वयत्वविषयाणि—पाठभेदः । ४. तेषाम्—अधिको पाठः । ९. द्वैतस्य—पाठभेदः । ५. प्रयुयुक्षते—पाठभेदः । १०. ( भ. गी. २।२५ )