BharatKosha
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

Page 354 of 364

Read in context
Page 354

३२४ उपदेशसाहस्री उसी प्रकार "यह अच्छेद्य और अदाह्य है"१ इस स्मृति के अनुसार समस्त भूतों का अविषय होने से मैं अविकारी हूँ। इसी प्रकार इस शरीर और इन्द्रियसंस्थानमात्र को लक्ष्य बनाकर जो मेरे भक्तों और अभक्तों को इसका प्रिय अथवा अप्रिय साधन करने की इच्छा होती है, तथा उसके कारण उन्हें जो पुण्य एवं पाप की प्राप्ति होती है, वह भी उन्हें ही है। "मुझ अजर-अमर एवं अभयरूप२ आत्मा" में उसकी सत्ता नहीं है। जैसा कि "इसे पाप और पुण्य नहीं सताते३", "यह कर्म से न बढ़ता है न घटता है४", "वह बाहर-भीतर विद्यमान और अजन्मा है५", "वह संसारदुःख से लिप्त नहीं होता, क्योंकि वह उससे बाहर है६"—इत्यादि श्रुति-स्मृतियों से सिद्ध होता है, अनात्मवस्तु की सत्ता नहीं है—यही इसमें प्रधान हेतु है। द्वैत की सत्ता न होने के कारण आत्मा के अद्वयत्वविषयक जितने भी उपनिषद्वाक्य हैं, उन सभी की विस्तारपूर्वक आलोचना करनी चाहिये, आलोचना करनी चाहिए। यह द्विरुक्ति गद्य-प्रबन्ध की समाप्ति सूचित करने के लिए की गई है। भूत-भौतिक ही सक्रिय रहते हैं, मैं ज्ञानी तो समस्त विकार-विकारिसंघात का साक्षी निर्विकार हूँ। मेरा कोई शत्रु-मित्र आदि नहीं है। यदि कोई अपने मिथ्याज्ञान के कारण होनेवाले देहाभिमान से क्रियाफलस्वरूप प्रिय-अप्रिय का प्रयोग करना चाहे, तो वह मिथ्या ही है, क्योंकि मैं उसका विषय नहीं हूँ। अतः ब्रह्म- विद्याप्रतिपादक समस्त वेदान्तवाक्यों का बहुशाखोपसंहार न्याय से पुनः पुनः आलोचन करते रहना चाहिए ॥ ११६ ॥ इति श्रीमत्परमहंस-परिव्राजकाचार्य-श्रीमच्छङ्कर-भगवत्पूज्यपादकृतौ सकलवेदोपनिषत्सारोपदेशसाहस्र्यां गद्यभागः समाप्तः ॥ इति श्रीमत्परमहंस—परिव्राजकाचार्य—श्रीमच्छङ्करभगवत्पूज्यपादकृतौ सकलवेदोपनिषत्सारोपदेशसाहस्र्यां गद्यभागस्य मुसलगाँवकरोपनामकेन श्रीगजाननशास्त्रिणा कृता 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दीव्याख्या पूर्णतां गता ॥ ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥ १. (भ. गी. २।२४) २. (बृ. उ. ४।४।२५) तथा (प्र. उ. ५।७) ३. (बृ. उ. ४।४।२२) ४. (बृ. उ. ४।४।२३) ५. (मु. उ. २।१।२) ६. (कठ. उ. ५।११)