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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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उपोद्घातप्रकरणम् १३ गई है। अथवा संन्यास के उपायभूत ज्ञान की स्तुति की गई है। अतः निन्दित की अनुपादेयता (अग्राह्यता) और स्तुत को उपादेयता (ग्राह्यता) होने से तथा मोक्ष को कर्मसापेक्ष मानने पर संन्यासविधि की अनुपपत्ति होने से आत्मज्ञानरूप संन्यास ही मोक्ष का साधन है, यह स्पष्ट हो जाता है। श्लोक में आये हुए 'अतः' शब्द का अर्थ 'ज्ञान की कर्मनिरपेक्षता' है। इस कारण 'अत एव' का अर्थ होगा कि अपनी फलप्राप्ति में ज्ञान की कर्मनिरपेक्षता के कारण ही श्रुति ने ज्ञान (संन्यास) की स्तुति की है। उसी तरह एक अन्य श्रुतिलिङ्ग भी बता रहे हैं—वाजसनेयी शाखा के उपनिषद् में भी 'आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदं सर्वं विदितम्' यह उपक्रम कर अद्वय आत्मतत्त्व का दुन्दुभि आदि के दृष्टान्त द्वारा उपपादन किया है। तदनन्तर 'उक्तानुशासनासि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वम्' वाक्य से ज्ञान में अमृतत्वसाधनता का अवधारण (निश्चय) करना ही उसकी (ज्ञान की) कर्मनिरपेक्षता में लिङ्ग बताया है। अन्यथा 'एतावत्' इस अवधारण वचन की उपपत्ति नहीं हो पायगी। 'अमृतत्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेन' इस वाक्य के द्वारा बताये गये वित्तसाध्य कर्म में अमृतत्व- साधन के न होने में लिङ्ग का अनुसन्धान कर लेना चाहिये। 'विद्यां च अविद्यां च' वाक्य से विहित समुच्चय से विरोध भी नहीं है। क्योंकि यह वचन देवतोपासना में ज्ञान-कर्म के समुच्चय को बता रहा है। अन्यथा 'हिरण्मयेन पात्रेण' 'अग्ने नय सुपथा' इत्यादि वाक्यों से की गई मार्गयाचना आदि की उपपत्ति नहीं हो पायगी। 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः', "त्याग एव हि सर्वेषां मोक्षसाधनमुत्तमम् । त्यजेतैव हि तज्ज्ञेयं त्यक्तुः प्रत्यक् परं पदम् ॥" इत्यादि शास्त्रवाक्यों के द्वारा जब कि त्यागोपलक्षित आत्मज्ञान को ही मुक्ति का साधन बताया गया है, इसलिये साधन- चतुष्टयसम्पन्न तत्त्वजिज्ञासु मुमुक्षुओं को कर्म का त्याग कर देना चाहिये। जबकि विविदिषु को भी कर्म का अवसर नहीं है तब विद्वान् के लिये कर्म के अवसर की कथा का प्रसंग ही कहाँ है ? अतः मोक्ष की अपेक्षा होने पर कर्मसंन्यासपूर्वक ज्ञाननिष्ठ ही होना चाहिये ॥ २० ॥ अब अग्निष्टोम का दृष्टान्त बताकर ज्ञान में कर्म की सापेक्षता को समुच्चयवादी ने बताया था उसका उत्तर अग्रिम श्लोक के द्वारा दिया जा रहा है ॥ २०-२१ ॥ नैककारकसाध्यत्वात् फलान्यत्वाच्च कर्मणः । विद्या तद्विपरीताऽतो दृष्टान्तो विषमो भवेत् ॥ २२ ॥ नैकेति—कोई भी कर्म एक कारक से साध्य नहीं है अर्थात् अनेक कारकों से हो पाता है तथा उस कर्म के फल भी भिन्न हैं, और उसके विपरीत ज्ञान का स्वभाव है। इसलिये अग्निष्टोम का दृष्टान्त देना उचित नहीं है ॥ २२ ॥ हृदयस्पर्शिनी अग्निष्टोमादि कर्मों की निष्पत्ति अनेक कारकों से हो पाती है, अर्थात् तत्तत् कर्मों के द्रव्य, मन्त्र, तन्त्र, प्रयोग नियत रहते हैं; उनसे तत्तत्कर्मों का सम्पादन किया जाता है। उसी तरह विद्या और कर्म के फल में भी भेद है। छान्दोग्य- श्रुति कहती है कि विद्या द्वारा (अर्थज्ञान के साथ) जो कर्म किया जाता है, उससे वीर्यवत्तर फलविशेष की प्राप्ति होती है। इसलिये कर्म को सहकारी की अपेक्षा रहना उचित है। किन्तु विद्या के विषय में ऐसी बात नहीं है। अर्थात् कर्मस्वभाव के विपरीत स्वभाव, विद्या का है। ज्ञान तो वस्तुपरतन्त्र है अर्थात् यथावस्त्वधीन है और प्रमाणनिबन्धन है तथा निरतिशय मोक्ष ही उसका एकमात्र फल है। इसलिये उसे (विद्या को) किसी सहकारी की अपेक्षा नहीं होती। एवञ्च कर्म और विद्या दोनों के स्वभाव में भेद होने से अग्निष्टोम का दृष्टान्त प्रस्तुत दाष्ट्रान्तिक के अनुरूप नहीं है ॥ २२ ॥ कृष्यादिवत् फलार्थत्वादन्यकर्मोपबृंहणम् । अग्निष्टोमस्त्वपेक्षेत विद्यान्यत् किमपेक्षते ॥ २३ ॥