उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
Page 40 of 364
Read in context१४ उपदेशसाहस्री कृष्यादिवदिति—अग्निष्टोम का फल सातिशय है, इसलिये उसे कृषि आदि के समान अन्यान्य कर्मों की सहायता की आवश्यकता होती है। किन्तु ज्ञान (विद्या) का फल सातिशय न होने से उसे किस अन्य वस्तु की अपेक्षा हो सकती है ? ॥ २३ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वश्लोक में बताया गया था कि अग्निष्टोम का दृष्टान्त विषम ( अननुरूप ) है, उसी विषमता को इस श्लोक के द्वारा बताया जा रहा है—कृषि, वाणिज्य आदि में सामग्रीबाहुल्य और फलबाहुल्य के कारण उसे सहकारी की अपेक्षा हुआ करती है। तदनुसार अग्निष्टोम कर्म के विषय में भी कह सकते हैं—'अग्निष्टोमः सातिशयः साध्यफलार्थत्वात् कृष्यादिवत्।' कृषि, वाणिज्य आदि में फल के उपचय ( वृद्धि ) के लिये साधनविशेष के उपचय ( वृद्धि ) की आवश्यकता का होना जैसे प्रसिद्ध है, वैसे ही अग्निष्टोम कर्म को भी अन्यकर्मोपबृंहण आवश्यक होता है। अर्थात् अपने अन्य सहकारी विधिविहित उद्गथादि- अंगसंश्रित उपासनादिरूप कर्मों के द्वारा फलाधिक्य के लिये वह अपना उपबृंहण चाहता है। किन्तु विद्या तो निरतिशय- फलवाली है, अतः उसे अन्य किसी सहकारी की अपेक्षा नहीं होती। सहकारियों की न्यूनाधिकता पर फल की न्यूनाधिकता ( फल के अतिशय में न्यूनाधिकता ) निर्भर रहती है किन्तु जहाँ फल निरतिशय ( सातिशय नहीं ) है, वहाँ किसलिये और क्यों कर सहकारी की अपेक्षा होगी ? अर्थात् नहीं ही होगी ॥ २३ ॥ प्रत्यवायस्तु तस्यैव यस्याहङ्कार इष्यते । अहङ्कारफलार्थित्वे विद्येते नात्मवेदिनः ॥ २४ ॥ प्रत्यवाय इति—प्रत्यवाय भी उसी को हो सकता है, जिसे अहंकार हो। आत्मज्ञानी को न अहंकार है और न फल की इच्छा ही है। आत्मज्ञानी में दोनों का अभाव रहता है ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी समुच्चयवादी ने 'अकुर्वन् विहितं कर्म' इस प्रत्यवायस्मृति को उपस्थित किया था, वह स्वाभाविक अहंकारवाले अधिकारी के लिये है, वह यदि विधिविहित कर्म का अनुष्ठान न करे तो उसके लिये वह स्मृति प्रत्यवाय बता रही है। 'इस कर्म का मैं कर्ता हूँ, इस कर्म का अनुष्ठान कर उसके फल को मैं प्राप्त करूंगा' यही अहंकार का स्वरूप है। ऐसे अहंकारी अधिकारी के लिये उपर्युक्त स्मृति, प्रत्यवाय को बता रही है। आत्मतत्त्वज्ञाननिष्ठ पुरुष को न अहंकार है और न फल की इच्छा ही है, क्योंकि विषय रहने पर ही अहंकार होता है। उसकी दृष्टि में कोई विषय ही नहीं रहता। अतः अहंकाररूप निमित्त न होने से उसे प्रत्यवाय कैसे हो सकता है ? इसलिये ज्ञानी तथा अज्ञानी दोनों में समान अहंकार समझ कर नित्य- कर्म के अननुष्ठान ( अकरण ) से उसे भी प्रत्यवाय होगा, ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये ॥ २४ ॥ तस्मादज्ञानहानाय संसारविनिवृत्तये । ब्रह्मविद्याविधानाय प्रारब्धोपनिषत्त्वियम् ॥ २५ ॥ तस्मादिति—अतः अज्ञान की निवृत्ति के लिये तथा संसार का बाध और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिये इस उपनिषद् का प्रारंभ किया जा रहा है ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी काठकोपनिषद् में 'विद्यैवाज्ञानहानाय न कर्मप्रतिकूलतः' ऐसा उपक्रम कर कर्म स्वतन्त्ररूप से अथवा ज्ञान की सहायता से अर्थात् किसी भी प्रकार से मोक्षप्राप्ति कराने में साक्षात् कारण ( हेतु ) नहीं है यह उपपादन किया गया है। तदनन्तर 'ब्रह्मविद्यामथेदानीं वक्तुं वेदः प्रचक्रमे' के द्वारा ब्रह्मविद्या का प्रारंभ बताया गया है। श्लोक में 'तस्मात्' शब्द है, यहाँ 'तत्' शब्द का अर्थ कर्मनिरपेक्षता है। अर्थात् विद्या की कर्मनिरपेक्षता के कारण अनादि अज्ञान के निरास के लिये