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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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१८ उपदेशसाहस्री होना ही उचित है। तथापि विपरीत ही क्यों न माना जाय ? अर्थात् कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि के द्वारा ब्रह्मात्मबुद्धि का ही बाध होना क्यों न माना जाय ? इस आशंका का समाधान यह है कि ज्ञप्तिस्वरूप ब्रह्मात्मा को ही 'दृशि' कहते हैं, अर्थात् ब्रह्मात्माकार अन्तःकरणवृत्ति में प्रतिफलित होनेवाले अपरोक्ष स्फुरण को 'दृशि' कहते हैं। वह एक है अर्थात् किसी पर (द्वितीय) के न होने से उसे अद्वितीय कहते हैं। वह स्वयं सिद्ध है, अर्थात् किसी अन्य की अपेक्षा किये बिना भी उसकी सत्ता का स्फुरण होता है। इन निर्दिष्ट विशेषणों से स्पष्ट होता है कि वह ( आत्मतत्व ) बाध होने योग्य नहीं हैं, क्योंकि उसका कोई बाधक ही नहीं है। उसका ज्ञान भी परमार्थविषयक होने से बाध के योग्य नहीं है। उस ज्ञान का फल भी बाध होने योग्य नहीं है, अर्थात् अबाध्य है। ज्ञान से अभिव्यक्त होने वाले एवं बाधरहित ब्रह्मात्मतत्त्व को ही औपचारिक फल कहा गया है। अर्थात् नित्यसिद्ध ब्रह्मात्मतत्त्व में 'फल' शब्द का प्रयोग लाक्षणिक है, क्योंकि विषयाकार वृत्ति के द्वारा उसकी अभिव्यक्ति होती है। एवं च वस्तु, उसका ज्ञान और उसके फल का बाध न हो सकने से उसके द्वारा कर्त्रादिबुद्धि का ही बाध होना उचित है। यदि कहें कि पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि का उत्तरकालिक आत्मज्ञान के द्वारा बाध मानने पर उपजीव्य विरोध होगा, अतः कर्तृत्व बुद्धि को बाध्य कैसे कहा जाय ? किन्तु यह शंका अधिक देर टिक नहीं पाती, क्योंकि पूर्वकालिक कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि के व्यवहार में अंगरूप अंश का उत्तरकालिक आत्मज्ञान से बाध नहीं किया जाता, अतः उपजीव्य विरोध की शंका करना ठीक नहीं है। शब्द प्रमाण को पदार्थ का ज्ञान कराने में प्रमाणान्तर की अपेक्षा रहने पर भी, वाक्यार्थ का ज्ञान कराने में उसे अन्य प्रमाण की अपेक्षा नहीं रहती। पदार्थ बोध में भी केवल व्यवहार की ही अपेक्षा रहती है। एवं च अत्यन्त अबाध्य अर्थ होने से औपनिषद आत्मज्ञान ही तत्त्वावेदक है॥ ३॥ इदं वनमतिक्रम्य शोकमोहादिदूषितम् । वनाद् गान्धारको यद्वत्स्वात्मानं प्रतिपद्यते ॥४॥ इदमिति- जिस प्रकार गान्धार देश निवासी कोई पुरुष वन को पार कर अपने देश पहुँच गया। उसी प्रकार शोकमोहादि दोषों से दूषित इस देहरूप वन को पार कर मुमुक्षु पुरुष अपने आत्मस्वरूप को पा लेता है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी वेदान्तवाक्य से ब्रह्मात्मज्ञान की अनुत्पत्ति की आशंका का उन्मूलन कर, तथा वेदान्तवाक्यजन्य ब्रह्मात्म- ज्ञान की प्रबलता का उपपादन कर पूर्वप्रवृत्त प्रत्यक्ष आदि के द्वारा उसके बाधित होने की आशंका का उन्मूलन किया गया। अब एक श्रौत दृष्टान्त देकर पदार्थपरिशोधन द्वारा उस ब्रह्मात्मज्ञान की उत्पत्ति का निरूपण इस श्लोक के द्वारा किया जा रहा है। एक वन का रूपक देकर शरीर को बता रहे हैं। वन में जैसे व्याघ्र, तस्कर आदि होते हैं, उसी तरह इस शरीररूपी वन में व्याघ्र, तस्कर आदि के स्थानापन्न राग, द्वेष, मोह, शोक आदि बसे हुए हैं। इन राग, द्वेषादि से व्याप्त होने के कारण दूषित इस शरीररूपी वन को पार कर आचार्य से किञ्चिन्मात्र निर्देश पाकर अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा पदार्थशोधन करते हुए देह आदि को अनात्मा जानकर त्यागते हैं और सर्वत्र अनुस्यूत एवं अबाधित आत्मतत्त्व को प्राप्त करते हैं। अर्थात् 'अहं ब्रह्मास्मि' इस प्रकार औपनिषद पुरुष को जानते हैं। जैसे गान्धारदेश-निवासी किसी पुरुष को तस्करों ने उसकी आँखें बाँधकर किसी घोर जंगल में लाकर छोड़ दिया। वह पुरुष बन्धन से छुटकारा पाने के लिये चिल्लाने लगा, तो उसी जगह कोई दयालु महापुरुष आ पहुँचा, और उसने उसको बन्धन से मुक्त कर दिया। उस दयालु महापुरुष ने उसे अपने स्वदेश जाने का मार्ग बता दिया। तब वह बुद्धिमान् पुरुष गाँव-गाँव पूछता हुआ वन से अपने स्वदेश पहुँच जाता है। उसी तरह इस संसारी पुरुष की आँखों पर मिथ्या अज्ञान की पट्टी, इन अविद्या, राग आदि तस्करों ने बाँध दी है। अर्थात् इसकी विवेकदृष्टि को मिथ्या अज्ञान- रूपी वस्त्र से ढँक दिया है। और उसको अपने स्वदेश से लाकर देहरूपी अरण्य में छोड़ दिया है। तब वह अपनी आँख पर बंधी पट्टी को दूर करने की इच्छा से आक्रोश कर रहा है, उसके उस आक्रोश को सुनकर कदाचित् कोई परमकारुणिक ब्रह्मवित् आचार्य वहाँ पहुँचकर उसकी आँख पर बंधी मिथ्या अज्ञानरूपी वस्त्र की पट्टी खोल देते हैं और उसे उसके स्वदेशरूप ब्रह्मात्मा का निर्देश कर देते हैं, तब वह स्वयं अन्वयव्यतिरेक के सहारे ऊह करता हुआ अपने स्वरूप को पा लेता है और कृतकृत्य हो जाता है ॥४॥ ॥ इति द्वितीयं प्रतिषेधप्रकरणं समाप्तम् ॥