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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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ईश्वरात्मप्रकरणम् ईश्वरश्चेदनात्मा स्यान्नासावस्मीति धारयेत् । आत्मा चेदीश्वरोऽस्मीति विद्या साऽन्यनिवर्तिका ॥१॥ ईश्वरश्चेदिति—यदि ईश्वर अनात्मा होता, तो मुमुक्षु को वह ईश्वर (ब्रह्म) मैं हूँ, यह ज्ञान कभी न होता, और यदि उसे यह ज्ञान हो जाय कि 'मैं ईश्वर हूँ' तो यह ज्ञान अपने से भिन्न की निवृत्ति करता है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसके पूर्व प्रकरण में जो ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन किया उसमें प्रकाशमान जो ब्रह्म है, वह प्रत्यगात्मा ( जीव ) से भिन्न है अथवा अभिन्न ? यह सन्देह इसलिये हो रहा है कि 'द्वा सुपर्णा सयुजा' श्रुति में भेद सुनाई पड़ रहा है, और 'अयमात्मा ब्रह्म' श्रुति में अभेद सुनाई पड़ रहा है। इस सन्देह का निराकरण प्रस्तुत प्रकरण में किया जा रहा है। सत्य, ज्ञान, अनन्त, आनन्द रूप परमात्मा (ईश्वर), जिसे जगत् का कारण माना जाता है, वह मेरु पर्वत आदि के समान अनात्मरूप है या आत्मरूप है? यदि वह मेरु की तरह अनात्मरूप हो तो जैसे कोई भी मेरु में अहं- बुद्धि अर्थात् 'मेरु ही मैं हूँ' नहीं मानता, वैसे ही ईश्वर को अनात्मरूप मानने पर कोई भी मुमुक्षु अपने को 'मैं ईश्वर हूँ' नहीं समझेगा । तब 'तत्त्वमसि' ( वही तू है ) इस वचन से विरोध होगा। अर्थात् 'तत्त्वमसि' वाक्य संगत नहीं होगा, और 'आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च' इस न्याय के साथ भी विरोध होगा। यदि 'ईश्वर एव आत्मा अहमस्मि नान्यः' ईश्वर ही मैं हूँ, कोई अन्य नहीं हूँ, ऐसा समझे तो न श्रुति के साथ और न न्याय के साथ ही विरोध होगा । यह अभिन्नाकार ब्रह्मात्मैक्यज्ञान अविद्या एवं तत्कार्यभूत समस्त संसार का निवर्तक होता है। 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति' जो ब्रह्म जानता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है, ब्रह्म होता हुआ ही ब्रह्म को प्राप्त होता है। इस श्रुति ने ब्रह्मज्ञान का फल ब्रह्मभाव होना ही बताया है। अन्य को किसी अन्य का भाव प्राप्त होना संभव नहीं है। अतः ऐक्यज्ञान ही फलवान् है, और उसीमें शास्त्र का तात्पर्य है, भेद में नहीं । भेदज्ञान का कोई फल नहीं है और भेदज्ञान की 'अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद' वाक्य के द्वारा निन्दा की गई है। जहाँ कहीं भेद श्रवण हो, वहाँ उसका तात्पर्य अनादि अविद्या से कल्पित भेद के अनुवाद में ही समझना चाहिये, स्वार्थ में नहीं ॥ १ ॥ आत्मनोऽन्यस्य चेद्धर्मा अस्थूलत्वादयो मताः । अज्ञेयत्वेऽस्य किं तैः स्यादात्मत्वे त्वन्यधीहृतिः ॥२॥ आत्मन इति—यदि अस्थूलत्व अनणुत्व आदि धर्म आत्मभिन्न ईश्वर के हों तो उस आत्मभिन्न ईश्वर के अज्ञेय होने के कारण उन धर्मों के श्रवण से जिज्ञासु को कौन-सा लाभ होगा ? और यदि ईश्वर का आत्मा से अभिन्न रूप में (आत्म स्वरूप से ) बोध होगा तो उसमें (ईश्वर में) अनात्म धर्मों (स्थूलत्व, कृशत्व आदि) की जो बुद्धि हो रही है वह निवृत्त हो जाती है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्यगात्मा (जीवात्मा) और ब्रह्म (ईश्वर) के अभेद में ही वेद (श्रुति) का तात्पर्य है। क्योंकि अस्थूलादि श्रुतिवाक्यों के पर्यालोचन से दोनों ( ईश्वर अर्थात् ब्रह्म और प्रत्यगात्मा अर्थात् जीव) एक ही (अभिन्न) प्रतीत होते हैं । श्रुतिप्रतिपादित अस्थूलत्वादि धर्मों को यदि प्रत्यगात्मा (जीवात्मा) से भिन्न ईश्वर के कहें तो वह ईश्वर अनात्मभूत (आत्मभिन्न) होने से अज्ञेय कहा जायगा, तब श्रुतिप्रतिपादित उसके अस्थूलत्वादि धर्मों के श्रवण से मुमुक्षु को कौन-सा लाभ होना है? अर्थात् कोई लाभ नहीं। क्योंकि उस श्रवण से मैं स्थूल हूँ, मैं कृश हूँ, इत्यादि स्वगत (अपने में होने वाली) भ्रान्ति की निवृत्ति तो हो नहीं सकेगी। यदि ईश्वर (ब्रह्म) और जीवात्मा