उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context२० उपदेशसाहस्री (प्रत्यगात्मा) दोनों को एक ही (अभिन्न) समझते हैं अर्थात् 'अस्थूलत्वादि धर्मवाला ईश्वर मैं हूँ' यह समझते हैं, तब दोनों के एक ही रहने से स्वात्मा (जीवात्मा) में होनेवाली स्थूलत्व, कृशत्वादि की भ्रान्त बुद्धि जो मोह के कारण हो रही थी, उसका बाध श्रुत्युक्त धर्मों (अस्थूलत्वादि) के श्रवण से हो जाता है। आत्मा में स्थूलत्व, कृशत्व आदि की बुद्धि, मोहमूलक होने से मिथ्या है। अतः जीवात्मा को ईश्वर (ब्रह्म) समझना ही समुचित है। दोनों में भेद नहीं है ॥२॥ मिथ्याध्यासनिषेधार्थं ततोऽस्थूलादि गृह्यताम् । परत्र चेन्निषेधार्थं शून्यतावर्णनं हि तत् ॥३॥ मिथ्येति—आत्मा में स्थूलत्व, कृशत्वादि के भ्रम (मिथ्या अध्यास) की निवृत्ति के लिये ही 'अस्थूलमणणु' आदि वाक्य को मानना चाहिये। यदि उक्त श्रुतिवाक्य को आत्मभिन्न अनात्म वस्तु के निषेधार्थ माना जाय तो शून्यवाद (शून्यता वर्णन) ही हो जायगा। अनात्म पदार्थ जड़ होने से स्थूलत्वादि धर्मों से युक्त ही हुआ करते हैं। यदि उनका निषेध यहाँ कहा जाय तो ईशयितव्य वस्तु ही कोई नहीं होगी, और उसके न रहने पर ईश्वर का ईश्वरत्व ही नहीं रह सकेगा, तब शून्यवाद का प्रसंग प्राप्त होगा ॥३॥ हृदयस्पर्शिनी 'कस्मिन्नु खलु आकाश ओतश्च प्रोतश्च' इस प्रकार कार्य-कारणात्मक जगत् के विषय में प्रश्नोत्तर करते हुए 'अक्षर' का उपक्रम किया ओर 'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि' इस प्रकार जगदीश्वर के रूप से मध्य में परामर्श करते हुए 'अहं द्रष्टृ' इत्यादि के द्वारा उसके स्वभाव का कथन कर अन्त में 'एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च' कहकर उपसंहार किया गया है। इससे यह स्पष्ट है कि सम्पूर्ण ब्राह्मणवाक्य का तात्पर्य ईश्वरपरक ही है। बृहदारण्यक उपनिषद् में प्रत्यगात्मा का अक्षरब्रह्म से अभेद का ही निश्चय किया गया है। जबकि ईश्वर और आत्मा के अभेद में ही शास्त्र का तात्पर्य है, तब उक्त अस्थूलादि वाक्य को प्रत्यगात्मा में अध्यस्त स्थूलत्वादि के प्रतिषेधपरक ही समझना चाहिये। एवंच अज्ञानमूलक मिथ्याध्यास की निवृत्ति के लिये अस्थूलत्वादि को प्रत्यगात्मा के विशेषण समझने चाहिये। अन्यथा अस्थूलादि वाक्य को आत्मभिन्न अनात्म पदार्थ (ईश्वर) के स्थूलत्वादि धर्मों के निषेध के लिये यदि कहें तो उसे शून्यता का ही वर्णन कहा जायगा। आत्मा से अन्य सभी कुछ जड़ है, उनमें स्थूलत्वादि धर्म रहते ही हैं, वे सभी जब निषेध्य कोटि में आ जायेंगे तब ईश्वर में ईश्वरत्व का भी सम्बन्ध नहीं रहेगा अर्थात् ईश्वर में पराग्रूपता (अनात्मता) मानने से घट की तरह अनीश्वरत्व का प्रसंग प्राप्त होगा, और उक्त वाक्य केवल निषेधपरक ही रहेगा। अतः अस्थूलत्वादि धर्मवाले में अनात्मत्व का सम्बन्ध न रहने से उसे ईश्वर ही कहना होगा, वह (ईश्वर) आत्मा ही है, अन्य कोई नहीं, यही स्वीकार करना उचित है ॥३॥ बुभुत्सोर्यदि चान्यत्र प्रत्यगात्मन इष्यते । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र इति चानर्थकं वचः ॥४॥ बुभुत्सोरिति—प्रत्यगात्मा से भिन्न देहादि अनात्मा में स्थूलत्वादि धर्मों का निषेध करना ही जिज्ञासु को यदि इष्ट हो तो 'अप्राणो ह्यमनाः' वह (आत्मा) प्राणहीन, मनोहीन है, इत्यादि वाक्य व्यर्थ हो जायगा। प्राणादि का अनात्म पदार्थ में अभाव रहने से यह वचन अप्राप्त का निषेधक कहलायेगा ॥४॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मतत्त्वजिज्ञासु व्यक्ति यदि जीवात्मा से भिन्न देह, इन्द्रिय, प्राण, मन के धर्मों का निषेधक यह वाक्य (अस्थूलमणणु) है, ऐसा समझे तो 'अप्राणः' इत्यादि वाक्य निर्विषय (व्यर्थ) होगा, क्योंकि अनात्मा में प्राण और मन का सम्बन्ध प्राप्त नहीं है। अतः अप्राप्त प्रतिषेध, दृष्टार्थ न हो पाने से निष्फल होगा। और अप्राणादि वाक्य अनर्थक होगा ॥ ४ ॥ ॥ इति तृतीय ईश्वरात्मप्रकरणं समाप्तम् ॥