उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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तत्त्वज्ञानस्वभावप्रकरणम् अहंप्रत्ययबीजं यदहंप्रत्ययवत्स्थितम् । नाहंप्रत्ययवह्ल्युष्टं कथं कर्म प्ररोहति ॥१॥ अह्मिति—अहंकार का जो बीजरूप कर्म अहं-प्रत्यय से युक्त अन्तःकरण में स्थित है, वह 'मैं अहंकार नहीं हूँ' इस ज्ञानाग्नि से दग्ध हो जाने पर पुनः कैसे पैदा हो सकता है? ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'अहं ब्रह्मास्मि' इस ब्रह्मात्मज्ञान ( ईश्वर से अभिन्न आत्मा का ज्ञान ) को मोक्ष का साधन बताया गया है, किन्तु वह कैसे संभव है ? क्योंकि अनेक जन्मों के अनेक सञ्चित कर्म रहते हैं, अतः उनका फल अवश्य ही प्राप्त होना है । एवञ्च उन सञ्चित कर्मों के प्रतिबन्धक रहते ब्रह्मात्मैक्यज्ञान, मोक्ष का साधन नहीं हो सकेगा । 'अहम्' इस प्रत्यय को 'अहंकार' ( अनात्मा में आत्माभिमान ) कहते हैं । उस अहंकार के कारण ही मनुष्य कर्म करता है, अर्थात् कर्म और अहंकार का कार्य-कारणभाव सम्बन्ध है । तात्पर्य यह है कि अहम्प्रत्यय ( अहंकार ) ही कर्म का कारण ( बीज ) है । जिस साभास अन्तःकरण में 'अहम्' अर्थात् 'मैं' इस प्रकार की प्रतीति होती है, उस अन्तःकरण को 'अहम्प्रत्ययवत्' कहते हैं । अथवा 'अहम्' इस प्रकार की प्रतीति जिस अहंकार में होती है, वह साभास अहंप्रत्यय जिस कर्म का उपादान कारण (बीज) है, उस कर्म को 'अहम्प्रत्ययबीज' शब्द से कहा गया है । मूलाज्ञान (मूलाविद्या) के कार्यरूप अहम्प्रत्यय- विशिष्ट-अहंकार में 'कर्म' की स्थिति रहती है, इसलिये 'कर्म' को 'अहम्प्रत्ययवत्स्थित' शब्द से कहा गया है । क्योंकि कार्य का अपने उपादान में रहने का ही नियम है, अन्यत्र नहीं । एवं च अहंप्रत्ययवत् (अहंकारविशिष्ट) साभास अहंकार में अथवा अन्तःकरण में सञ्चित कर्म जब 'नाहं कर्ता भोक्ता किन्तु ब्रह्मैवास्मि' 'मैं कर्ता, भोक्ता नहीं हूँ, मैं तो ब्रह्म ही हूँ' इस प्रकार वेदान्त वाक्य से उत्पन्न हुए ज्ञानाग्नि के द्वारा दग्ध हो जाता है ( जला दिया जाता है ), तब वह ( संचित कर्म ) पुनः फलोन्मुख नहीं होता । जैसे अग्नि; जलाने योग्य वस्तुओं को जलाता है, वैसे ही वेदान्त- वाक्योत्पन्न 'नाहं कर्ता ब्रह्म वाह्मस्मि' यह ज्ञान सञ्चित कर्मों को जला देता है, इसलिये वेदान्तवाक्योत्पन्न ज्ञान 'नाहं कर्ता, ब्रह्मैवाह्मस्मि' को अग्नि शब्द से कहा गया है । जैसे दग्ध हुए ( जले हुए ) बीज से अंकुर पैदा नहीं हो पाता वैसे ही ज्ञानाग्नि से दग्ध हुए सञ्चित कर्म से फलोत्पत्ति नहीं होती । वेदान्तवाक्य से आत्मतत्त्वज्ञान होनेपर मूलाज्ञान ( मूलाविद्या ) की निवृत्ति होना सुनिश्चित है, क्योंकि अज्ञान और ज्ञान दोनों परस्परविरुद्ध हैं । मूलाज्ञान की निवृत्ति होने से उसके कार्यभूत अन्तःकरण की भी निवृत्ति हो जाती है । जब अन्तःकरणरूप आश्रय ही नहीं रहा, तब 'कर्म' कहां स्थित रहेंगे ? निराश्रय तो रह नहीं सकते । अतः पूर्वोक्त शंका ( सञ्चित कर्मरूप प्रतिबन्धक के रहते आत्मज्ञान विफल होगा ) उचित नहीं है । निष्कर्ष यह हुआ कि वेदान्तवाक्योत्पन्न ब्रह्मात्मज्ञान ही मोक्षप्राप्ति का एकमात्र उपाय ( साधन ) है ॥ १ ॥ दृष्टवच्चेत्प्ररोहः स्यान्नान्यकर्मा स इष्यते । तन्निरोधे कथं तत्स्यात्पृच्छामो वस्तुच्यताम् ॥२॥ दृष्टवदिति—यदि यह कहा जाय कि दृष्टफलोत्पादक भिक्षाटनादि कर्मों के समान तत्त्वज्ञानी के संचित कर्म भी फल देंगे । किन्तु यह कहना इसलिये ठीक नहीं है कि ज्ञानी का भिक्षाटनादि व्यापार तो प्रारब्धकर्म के कारण हो रहा है । तथापि पुनः प्रश्न उत्पन्न होता है कि तत्त्वज्ञानाग्नि से मूलाविद्यारूप अज्ञान की निवृत्ति जब हो जाती है, तब उसका (अज्ञान का) कार्यभूत प्रारब्ध कर्म भी कैसे रहेगा ? इसका समाधान कीजिये ॥२॥ हृदयस्पर्शिनी शंका करनेवाले का अभिप्राय यह है कि ज्ञानी के भिक्षाटनादि कर्मों का फल उसे जैसे उपलब्ध होता है, वैसे ही विधिविहित अग्निहोत्रादि कर्मों का अदृष्ट फल भी उसे क्यों नहीं मिलेगा ? किन्तु यह शंका ठीक नहीं है,