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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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तत्त्वज्ञानस्वभावप्रकरणम् २३ लेश (अविद्यासंस्कार) है, उसकी निवृत्ति नहीं कर पाता है, क्योंकि उसका (प्रारब्धकर्म से उत्पन्न ज्ञान का) उपजीव्य के साथ कोई विरोध नहीं है। एवंच आरब्धफलकर्म और ज्ञान दोनों में कोई विरोध नहीं है। किन्तु अनारब्धफलवाले कर्मों का (संचित-क्रियमाणकर्मों का) तथा उनके फलों का अकर्तृभूत आत्मतत्त्व के ज्ञानोदय (ज्ञानोत्पत्ति) के साथ विरोध है, अतः कर्तृत्वभाव (अहंकार या अन्तःकरण) की निवृत्ति होने पर आश्रय के न रहने से अनारब्धफलवाले कर्मों का न रह पाना संगत ही है। ज्ञान के साथ उन कर्मों का सहावस्थान हो ही नहीं सकता। प्रारब्धकर्म प्रवृत्त- फलवाला है और अनारब्धकर्म अप्रवृत्तफलवाला है, यही दोनों में भेद है ॥ ४ ॥ देहात्मज्ञानवज्ज्ञानं देहात्मज्ञानबाधकम् । आत्मन्येव भवेद्यस्य स नेच्छन्नपि मुच्यते । ततः सर्वमिदं सिद्धं प्रयोगोऽस्माभिरोरितः ॥५॥ देहात्मेति-आत्मज्ञानी को भी यदि प्रारब्ध कर्म का भोग भोगना ही पड़ता है तो बहुत संभव है कि भोगते- भोगते उसे पुनः देहाभिमान हो जाय, और उससे ज्ञान प्रतिबद्व होकर उसका मोक्ष न हो पाय । इस आशंका का समा- धान इस प्रकार दिया जा रहा है कि जिस प्रकार संसारी (अज्ञानी) पुरुषों को देहात्मबुद्धि हो रही है, उसी प्रकार जिसे आत्मा में ही देहात्मबुद्धि को निवृत्त करनेवाला 'ज्ञान' हो गया हो, वह पुरुष इच्छा न करने पर भी मुक्त हो जाता है। अतः प्रारब्ध से आत्मज्ञान का अविरोध आदि सब बातें सिद्ध हो चुकीं। तत्संबंधी युक्तियों को हम पहले बता चुके हैं ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी देहारम्भक कर्मनिबन्धन भोग यदि ज्ञानी को होता है, तो कदाचित् देहात्माभिमान से उत्पन्न दुरित, 'ज्ञान' का प्रतिबन्धक भी हो सकता है, तब मोक्षप्राप्ति कैसे संभव हो सकेगी ? इसका समाधान यह है कि जैसे अविवेकी लौकिक पुरुष को अपने देह में ही 'मनुष्योऽहम्' मैं मनुष्य हूँ, इस प्रकार निःसन्दिग्ध आत्मज्ञान होता है, वैसे देह से लेकर अहंकार तक के साक्षी आत्मा (मुख्यात्मा) में ही जिसको देहात्मज्ञान का बाधक 'अहमस्मि परं ब्रह्म' मैं ब्रह्म हूँ, यह निःसन्दिग्ध ज्ञान हो जाता है, उस पुरुष की इस ब्रह्मज्ञान के बलपर समस्त अनर्थराशि (मूलाज्ञान, उसका कार्य, उसके संस्कार आदि सभी कुछ) निवृत्त हो जाती है, उस स्थिति में मुक्ति की इच्छा न रहनेपर भी उस ज्ञानबल पर वह मुक्त ही है। एवंच आत्मतत्त्वज्ञान के आविर्भूत होनेपर पुनः देहाभिमान होने का कोई कारण ही नहीं है, अतः मोक्ष में कोई प्रतिबन्धक नहीं है। श्रुति-स्मृतियाँ भी इसका समर्थन करती हैं ॥ ५ ॥ ॥ इति चतुर्थन्तत्त्वज्ञानस्वभावप्रकरणं समाप्तम् ॥