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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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बुद्धयपराधप्रकरणम् मूत्राशङ्को यथोदङ्को नाग्रहीदमृतं यथा । कर्मनाशभयाज्जन्तोरात्मज्ञानाग्रहस्तथा ॥१॥ मूत्राशङ्केति—जिस प्रकार उदङ्क ऋषि ने मूत्र की आशंका से अमृत को ग्रहण नहीं किया उसी प्रकार वर्णाश्रमविहित कर्म नष्ट हो जायगा, इस भय से संसारी जीव आत्मज्ञान को स्वीकार नहीं करता ॥ १॥ हृदयस्पर्शिनी यदि पूर्वप्रकरणप्रदर्शित प्रक्रिया के अनुसार 'ब्रह्मात्मज्ञान' अमृतत्व (मोक्ष) का साधन है, तो सभी लोग 'अहं ब्रह्मास्मि' 'मैं ब्रह्म हूँ' इस आत्मज्ञान का स्वीकार क्यों नहीं करते ? सभी को स्वभावतः ही परमपुरुषार्थ (मोक्ष) की इच्छा तो रहती है। इस आशंका का समाधान एक आख्यायिका के द्वारा कर रहे हैं—उदङ्क नाम के किसी ऋषि ने अपनी तपस्या के द्वारा भगवान् महाविष्णु को सन्तुष्ट कर लिया और उनसे देवताओं के लिये सुरक्षित अमृत को माँगा, तब भगवान् महाविष्णु ने 'इसे अमृत दे दो' ऐसा देवेन्द्र से कहा । तब इन्द्र महाविष्णु की आज्ञा के अनुसार अमृतकलश को वहाँ ले गये और चाण्डालवेष धारण कर लिया तथा अमृतकलश को अपने मूत्राशयस्थान में रख लिया और सोचा कि ऐसा करने से ऋषि को असूया होगी और वह अमृतपान नहीं करेगा। यह सब मनमें सोचकर इन्द्र ने उदङ्क ऋषि को अमृत देना आरंभ किया। तब उदङ्क को भी आशंका हुई कि कहीं यह चाण्डाल का मूत्र तो नहीं है? इस प्रकार मूत्र की आशंका से उदङ्क ऋषि ने प्रत्यक्ष रूप में वास्तविक अमृत की उपलब्धि होनेपर भी अमृत के रूप में इस मूत्र को पीने से मेरी जाति भ्रष्ट होगी, मैं जिस अमृत को चाहता था, वह यह नहीं है, अतः मुझे नहीं लेना है, ऐसा सोचकर उसे जिस प्रकार स्वीकार नहीं किया उसी तरह लोगों को भी यह भय रहता है कि हमारा वर्णाश्रमविहित कर्म कहीं नष्ट न हो जाय इसलिए लोग भी यथार्थ आत्मज्ञान के प्रति इच्छुक नहीं रहते, उसकी ओर अनादर की दृष्टि से देखते हैं। एवञ्च पदार्थ (वस्तु) के स्वरूप का वास्तविक ज्ञान न रहना तथा विपरीतज्ञान रहना ये दोनों श्रुत्युक्त आत्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त न करने में कारण हुआ करते हैं। अतः मुमुक्षु को चाहिये कि वह पदार्थविवेकशील बनें ॥ १ ॥ बुद्धिस्थश्चलतीवात्मा ध्यायतीव च दृश्यते । नौ गतस्य यथा वृक्षास्तद्वत्संसारविभ्रमः ॥२॥ बुद्धिस्थ इति—यह आत्मा बुद्धि में स्थित है, अतः चलता हुआ-सा, ध्यान करता हुआ-सा दिखाई देता है। जिस प्रकार नाँव में बैठकर जाते हुए व्यक्ति को तट पर स्थित वृक्ष चलते हुए-से दिखाई देते हैं, उसी प्रकार यह संसार का भ्रम हो रहा है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रथम श्लोक में दिये गये दृष्टान्त के द्वारा यह बताया गया था कि देवेन्द्र के वेषान्तर और मूत्राशय- स्थान (बस्तिस्थान) में अमृतकलश को छिपाकर रखने से जात्यन्तर के मूत्र का भ्रम उदङ्क को हुआ । इसी कारण उसने अमृत का ग्रहण नहीं किया । एवंच अमृत के ग्रहण न करने में देवेन्द्र का वेषान्तर करना और अमृत कलश को बस्तिस्थान में छिपाकर रखना ये दो ही कारण थे, इसीलिये उदङ्क को भ्रम हुआ । किन्तु ब्रह्मरूप आत्मा के सम्बन्ध में भ्रम होने का वैसा कोई कारण नहीं है, तब ब्रह्मात्मज्ञान में प्रवृत्ति क्यों नहीं होती ? इस आशंका का समाधान इस प्रकार किया गया है कि पदार्थविवेक होने से पूर्व अनादि अविद्या के कारण अपनी आत्मा में लिङ्ग शरीर का ज्ञान अध्यस्त रहने से आत्मा को उसका अभिमान रहता है। अर्थात् अध्यस्त बुद्धिरूप लिङ्ग शरीर में अभिमानी होकर आत्मा स्थित है। वह (आत्मा) वस्तुतः अविक्रिय (विकार-रहित) है, अतः वह चलता फिरता नहीं है, वह