BharatKosha
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

Page 52 of 364

Read in context
Page 52

२६ उपदेशसाहस्री (बुद्धि के) व्यापार को पृथक् अनुभव नहीं करता। अपने (बुद्धि में पड़े हुए) आभास का विवेक न होने से अपने में (चिदात्मा में) ही विकार का आरोप कर लेता है और मिथ्या अनुभव करता रहता है। इसी अभिप्राय का समर्थन ‘ध्यायतीव’ इत्यादि श्रुति के द्वारा किया गया है। अतः उपाधि के कारण उसे अपने में संसारी होने का भ्रम होता है ॥ ४ ॥ चैतन्यभास्यताहमस्तादर्थ्यं च तदस्य यत् । इदमंशप्रहाणे न परः सोऽनुभवो भवेत् ॥५॥ चैतन्येति—चिज्जडग्रन्थिरूप अहंकार की चैतन्यभास्यता (दृश्यता) और उसका आत्मार्थ (आत्मा का अंगभूत) होना, ये दोनों बातें अहंकार से ही संबन्धित हैं। इस इदमंश (अहंकार के दृश्यत्व) का विवेक हो जानेपर उपर्युक्त दोनों नहीं रह पाते, तब जो अनुभव होता है वही, पर-आत्मा है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अभी तक यह बताया गया था कि संसाराध्यास अविवेकाधीन है। किन्तु पदार्थ के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान (विवेकज्ञान) हुए पुरुष की वेदान्तवाक्य से ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इस प्रकार बुद्धिवृत्ति होती है, तब उसे मुक्ति का लाभ होता है। अतः मुमुक्षु को चाहिए कि वह पदार्थविवेकशील बने। चिदचिद्ग्रन्थिरूप अहंकार (अहम्) की जो चैतन्यभास्यता (दृश्यता) है, और चिदात्मा के लिए विषयोपस्थापक होने से उसका (अहंकार का) तदर्थ्य, है। ये दोनों (अहंकार की दृश्यता और चिदात्मा के प्रति अंग बनना) अहंकार से संबंधित हैं, उसमें ‘इदम्’ अंश का विवेक (प्रहाण) होने पर ये दोनों नहीं होंगे। अभिप्राय यह है कि अहंकार की चैतन्याकारता, जो मोह से प्राप्त हुई है और अहंकार में जो चेतनशेषत्व है, वह भी मोह से ही सिद्ध है, किन्तु यहाँ पर (अहम् में) ‘इदम्’ अंश का विवेक के द्वारा परित्याग करने पर उक्त दोनों बातें, जो मोह से हो रही थीं, वे नहीं हो पातीं। तब जो अनिदं अंश (इदम् अंश से भिन्न), जो अनुभव साक्षी के रूप में है, शेष रह जाता है (बचा रहता है) वही पर (परमात्मा) ही होगा। वही ‘अहं ब्रह्म’ वाक्य का अर्थ है। अथवा—जबकि इस अहंकार में चैतन्यभास्यता, (जड़ता) और तच्छेषत्व है, इस कारण यह अहंकार ‘आत्मा’ नहीं है। इस प्रकार वेद्यांश का त्याग करने से और अस्मदर्थता के अभिमान का त्याग करने से जो अनुभव होता है, वही पर-आत्मा है, यह निश्चय करना चाहिए। अथवा अहंकार के इदमंश को पृथक् करने से उस सर्वोत्कृष्ट ‘पर’ का अनुभव होता है। निष्कर्ष यह है कि अनिदंरूप अहंकार के इदमंश का मनन के द्वारा बाध होनेपर जो अवशिष्ट, अवाध्य अंश है, वही आत्मा है, यह अनुभव होगा। यदि कोई कहे कि ‘अहम्’ इस प्रतीति में ‘इदम्’ अंश का तो भास है ही नहीं, जिसके प्रहाण से सर्वोत्कृष्ट अनुभव होगा, किन्तु यह कथन ठीक नहीं है। सुषुप्तिकाल में केवल आत्मा का ही भान होता है। अहंकार का उस काल में अवभास नहीं होता, इसी कारण उसका अनात्मत्व निश्चित होता है। जाग्रत्काल में वह अहंकार अपने आप स्वयं आ जाता है, अतः उसमें चैतन्यभास्यता सिद्ध हो जाती है। इस कारण कहना होगा कि ‘अहम्’ इस प्रकार के अवभास में ‘इदम्’ अंश के न रहने पर भी चैतन्यभास्यत्वेन रूपेण इदमाकारता भासित होती है। दूसरा कारण यह भी है कि आत्मा में कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि व्यवहारनिर्वाहक के रूप में अहंकार, आत्मार्थ है अर्थात् आत्मा का शेष (अंग) है। इससे भी सिद्ध होता है कि ‘अहम्’ इस अवभास में अनात्मरूप ‘इदमंश’ है। एवंच उस इदमंश के प्रहाण से ब्रह्मात्मानुभव अवश्य हो सकता है। इस प्रकार पदार्थ का परिशोधन करनेपर वेदान्तवाक्योत्पन्न ‘अहं ब्रह्मास्मि’ यह ज्ञान होने से मनुष्य मुक्त हो जाता है ॥ ५ ॥ ॥ इति पञ्चमम्बुबुद्धयपराधप्रकरणं समाप्तम् ॥