उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextविशेषापोहप्रकरणम् छित्त्वा त्यक्तेन हस्तेन स्वयं नात्मा विशेष्यते । तथा शिष्टेन सर्वेण येन येन विशेष्यते ॥१॥ छित्वेति—काटकर डाल दिये हुए हाथ द्वारा स्वयं आत्मा ('मैं हाथवाला हूँ') इस प्रकार विशेषित नहीं होता, उसी प्रकार त्यक्तहस्तातिरिक्त सभी से अर्थात् छिन्न हाथ के अतिरिक्त शेष (बचे हुए) मनुष्यत्वादि जिन जिन विशेषणों से विशेषित किया जाता है, उनमें से किसी से भी वास्तव में वह विशिष्ट नहीं है ॥१॥ हृदयस्पर्शिनी वेदान्तवाक्य से 'अहं ब्रह्मा' मैं ब्रह्म हूँ, यह ज्ञान पदार्थविवेकवान् को होता है, यह पूर्व प्रकरण में बता चुके । वहीं पर 'अहम्' में स्थित 'इदमंश' के प्रहाण से साक्षितत्त्व (आत्मतत्त्व) के शोधन का सूक्ष्म उपाय भी बता चुके, किन्तु उस सूक्ष्म उपाय को अपनाने में जो असमर्थ हो, उसके लिये पदार्थशोधन के स्थूल उपाय को बताने के उद्देश्य से इस प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है। जो वस्तु अपने स्वरूप को अलग करके ज्ञात नहीं हो सकती, जैसे अग्नि की उष्णता; उष्णता तो अग्नि का स्वरूप ही है, वह अग्नि का विशेषण नहीं है, तथापि कहीं कहीं भेद की कल्पना कर विशेषणता का भी व्यवहार लोग किया करते हैं। सत् आत्मा में सत्ता, चैतन्य, आनन्द का कभी भी अभाव (विनाश) न होने से वे आत्मा के विशेषण नहीं हैं, अपितु वे आत्मा के स्वरूप हैं। और कृश, स्थूल, कृष्ण, गौर, मनुष्य, श्रोता, द्रष्टा, वक्ता, कामी, क्रोधी, ज्ञानी, कर्त्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी ऐसे ही अन्य भी आत्मा के विशेषण कहे जाते हैं, क्योंकि ये सत्ता आदि के समान आत्मा के स्वरूपभूत नहीं हैं। क्योंकि सुषुप्ति अवस्था में आत्मा की सत्ता रहने पर भी कृश, स्थूल आदिकों का अभाव रहता है। इन सबसे पृथक् रहने वाले में कूटस्थता का निश्चय करना चाहिये। जैसे हाथ कटने के बाद 'मैं हाथ वाला हूँ' ऐसा विशिष्ट प्रत्यय किसी को नहीं होता, वैसे ही 'मैं पैर वाला हूँ' ऐसा विशिष्ट प्रत्यय भी नहीं करना चाहिये ॥१॥ तस्मात्त्यक्तेन हस्तेन तुल्यं सर्वं विशेषणम् । अनात्मत्वेन तस्माज्ज्ञो मुक्तः सर्वैर्विशेषणैः ॥२॥ तस्मादिति—आत्मस्वरूप के अतिरिक्त समस्त वस्तुएँ अनात्म होने के कारण, वे सभी विशेषण, काटकर फेंक दिये गये हाथ के समान ही हैं। अतः आत्मा, अखिल (समस्त) विशेषणों से रहित है ॥२॥ हृदयस्पर्शिनी श्रोत्र आदि स्थूलदेहाश्रय होने से आत्मा के विशेषण नहीं हो सकते तो न हों, सुख-दुःखादि जो स्थूल- देहाश्रय नहीं हैं, उन्हें तो आत्मा के विशेषण समझा ही जा सकेगा। किन्तु विचार करने पर वे भी आत्मविशेषण नहीं बन पाते। स्थूल, सूक्ष्म दोनों देहों के धर्मों का आत्मा में व्यभिचार पाया जाता है, यह बात सभी के स्वानुभव- गम्य है। ऐसे व्यभिचारी धर्मों को आत्मविशेषण मानकर उनसे आत्मा को विशेषित नहीं समझना चाहिये। ये जितने भी अनात्मधर्म, अनात्मवस्तुएँ हैं, वे सब देह के ही विशेषण होते हैं, आत्मा के नहीं; वे सत्, चित्, आनन्द के समान आत्मा के स्वरूप भी नहीं हैं। इसीलिये ऐसा अनुमान प्रयोग भी करते हैं—'विमतानि विशेषणानि नात्म- स्वभावभूतानि विशेषणत्वात् छित्त्वा त्यक्तहस्तवत्।' इस कारण यह 'ज्ञ' अर्थात् विवेकज्ञानवान् समस्त विशेषणों से रहित चित्-सत्-आनन्दमात्रस्वरूप से ही अवशिष्ट रहता है ॥२॥