उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context२८ उपदेशसाहस्री विशेषणमिदं सर्वं साध्वलङ्करणं यथा । अविद्याध्यक्षस्तमतः सर्वं ज्ञात आत्मन्यसद्भवेत् ॥३॥ विशेषणमिति—अविद्या से उत्पन्न हुए अध्यास के कारण होनेवाले ये समस्त विशेषण भी पुरुष के आभूषणों के समान ठीक ही हैं। किन्तु आत्मज्ञान होने पर ये सब असत् ही हैं, ऐसा निश्चय होता है ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त रीति से विशेषणों के अनात्मरूप रहने पर भी उनका आत्मा से वियोग नहीं है, क्योंकि आगम तथा अपाय के द्वारा उनका आत्मा से सम्बन्ध निरन्तर बना रहता है। तथापि ये सब विशेषण अलंकार की तरह हैं। जैसे अलंकारों का अलंकार्य व्यक्ति के साथ सम्बन्ध रहने पर भी, वे अलंकार्य व्यक्तिस्वरूप या उसके धर्म नहीं समझे जाते, केवल उनका औचित्य समझा जाता है। अन्यथा उनका निकालना-पहिनना (आगम-अपाय) नहीं बन सकेगा। यदि ऐसी बात है तो 'मनुष्योऽहम्' मैं मनुष्य हूँ, ऐसी मनुष्यत्व के साथ तादात्म्य प्रतीति क्योंकर होती है ? तो उत्तर होगा कि मोह से ही वैसी प्रतीति होती है। ये सभी विशेषण आत्मा में अविद्या के द्वारा अध्यस्त हैं। अतः आत्मा के ज्ञात होने पर जब अविद्या की निवृत्ति हो जाती है, तब असत् पदार्थों का बाध हो जाता है। अर्थात् किसी भी काल में वे विद्यमान नहीं हैं यह निश्चय हो जाता है ॥ ३ ॥ ज्ञातैवात्मा सदा ग्राह्यो ज्ञेयमुत्सृज्य केवलः । अहमित्यपि यद्ग्राह्यं व्यपेताङ्गसमं हि तत् ॥४॥ ज्ञातैवेति—अतः ज्ञेय ( दृश्य ) का बाघ करके आत्मा का केवल ज्ञातारूप से ही सर्वदा अनुभव करना चाहिये। 'अहम्' इस प्रकार ग्राह्य ( ज्ञेय ) रूपसे आत्मा का जो अनुभव हो रहा है, वह भी कटे हुए अंग के समान ही वस्तुतः अनात्मा ही है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में "ज्ञात आत्मन्यसद् भवेत्" कहा गया है। 'तब ज्ञाते आत्मनि' अर्थात् आत्मा के ज्ञात होनेपर कहने से आत्मा में 'ज्ञेयत्व' धर्म की प्रतीति होगी, और अन्य विशेषणों की तरह 'ज्ञेयत्व' में अनात्मत्व कहना होगा। अतः 'ज्ञायमानत्व धर्म' से वस्तु में अनात्मत्व समझना उचित नहीं है। अर्थात् ज्ञेय पदार्थों को अनात्मा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि 'आत्मा' भी ज्ञेय है। किन्तु इस शंका का समाधान इस प्रकार होगा कि 'ज्ञेय' ( दृश्य ) अंश का त्याग कर जो सर्वदा सबका ज्ञाता है, वही 'आत्मा, है। ग्राह्यांश (ज्ञेयांश) आत्मा नहीं है। इतना ही नहीं, वह 'केवल' है, अर्थात् 'ज्ञातृत्व' विशेषण से भी रहित है। 'ज्ञातृत्व' तो उसका उपलक्षक है। एवं च ज्ञातृत्व से उपलक्षित ( सूचित ), अलुप्तप्रकाशस्वभाव होने से सर्वानुस्यूत, चिन्मात्र जो वस्तु है, वही 'आत्मा' है, इस प्रकार का ज्ञान विवेकी पुरुष को होता है। 'अहम्' इस प्रकार अनुभूयमान होने से ( अनुभव का विषय होने से ) ज्ञाता को ही 'आत्मा' कैसे कहा जाय ? शंका करनेवाला यद्यपि 'इदम् अहम्' 'यह मैं, इस प्रकार 'ग्राह्य' को ही आत्मा समझता है, तथापि वह ( इदमंश ) तो कटे हुए हाथ की तरह ही है। क्योंकि सुषुप्ति, मूर्छा की अवस्था में आत्मा के रहनेपर भी उसकी 'अहम्'-मैं-के द्वारा प्रतीति नहीं होती। अतः 'आत्मा' के रहनेपर उसकी 'अहम्' से प्रतीति अवश्य होती ही है, ऐसा कोई नियम नहीं है। वह तो आत्मा के द्वारा दृश्य है, इसलिये उसे आत्मा नहीं कह सकते। एवं च 'आत्मा' अहंप्रत्यय से भी ग्राह्य नहीं है ॥ ४ ॥ यावान् स्यादिदमंशो यः स स्वतोऽन्यो विशेषणम् । विशेषक्षयो यत्र सिद्धो ज्ञश्चित्रगुर्यथा ॥५॥ यावानिति—'अहम्' इस प्रत्यय में जितना 'इदम् अंश' ( दृश्यत्व ) है, वह आत्मा से पृथक् होने के कारण उसका विशेषण ही है। इस विशेषांश का भी जहाँ क्षय हो जाता है, वहाँ चित्रगु के समान आत्मा का निश्चय हो जाता है ॥ ५ ॥