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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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विशेषापोहप्रकरणम् २९ हृदयस्पर्शिनी जब कि 'आत्मा' अहं प्रत्यय से भी ग्राह्य नहीं, चक्षुरादि इन्द्रियों से भी ग्राह्य नहीं, तब उसके अस्तित्व में क्या प्रमाण है ? इस प्रकार शंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मा की सिद्धि स्वयमेव ही है, उसकी सिद्धि में अन्य की अपेक्षा नहीं होती । चिदचिदात्मक 'अहम्' प्रत्यय में जितना अचिदात्मक अहंकारादि इदमंश है, वह जिसका विशेषण हो, वही प्रत्यगात्मा है । एवं च अहंकारादि विशेषणों से अतिरिक्त, तथा समस्त विशेषणों की व्यावृत्ति (प्रक्षय) जहाँ हो जाती है, अर्थात् निर्विशेष और किसी अन्य की अपेक्षा किये बिना ही जिसका स्वरूप स्फुरित (लब्धसत्ताक) होता रहता है, वही प्रत्यगात्मा है। जैसे 'चित्रगुः देवदत्तः' में 'चित्रगुः' देवदत्त का विशेषण है। उस विशेषण से देवदत्त बिलकुल पृथक् है । उक्त विशेषण से सम्बन्ध होने के पूर्व ही उसका अस्तित्व सिद्ध है, अपनी सिद्धि (अस्तित्व) के लिये उसे विशेषण से सम्बन्ध रखने की आवश्यकता नहीं होती, उसी तरह 'आत्मा' भी अहंकारादि से सम्बन्ध होने के पूर्व से ही अपनी महिमा (प्रभाव) के द्वारा ही सिद्ध है। उसे अपने अस्तित्व के लिये अहंकार आदि की अपेक्षा नहीं होती । इसी अभिप्राय को अनुमान-प्रयोग के द्वारा भी कहा जा सकता है—'विमतं विशेषणं स्वविलक्षणविशेष्यनिष्ठं विशेषणत्वात् चित्रगुत्ववत् ।' एवं च प्रत्यगात्मा का अस्तित्व स्वतः सिद्ध है ॥ ५ ॥ इदमंशोऽहमित्यत्र त्याज्यो नात्मेति पण्डितैः । अहं ब्रह्मेति शिष्टांशो भूतपूर्वगतेर्भवेत् ॥ ६ ॥ इदमिति—'अहम्' इस प्रतीति में केवल 'इदमंश' ही पण्डितों के लिये त्याज्य है । 'आत्मा' का त्याग अभीष्ट नहीं है । 'अहं ब्रह्मास्मि' इस वाक्य में पूर्व प्रसंग के ( भूतपूर्वगति के ) अनुसार अवशिष्ट अंश का ही ग्रहण किया गया है ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी जब कि 'अहम्' भी अनात्मा है तब 'अहं ब्रह्म' यह तादात्म्यबोधक श्रुति कैसे उपपन्न हो सकेगी ? यह शंका, श्रुति के तात्पर्य को न समझने के कारण हो रही है । 'अहं ब्रह्म' यह श्रुति अध्यस्त अहंकार के मूल की निवृत्ति के लिये है, 'अहंकार' में आत्मत्वप्रतिपत्ति कराने के लिये नहीं है, अर्थात् अहम् (अहंकार ) आत्मा है, यह बताने के लिये नहीं है । 'अहम्' कहने पर अहंकार का अवभास होता है, उसमें जो इदमंश है, वह दृश्य होने से 'आत्मा' नहीं है, इस बात को बुद्धिमान् लोग अच्छी तरह समझ लें, अर्थात् उस अहम् ( अहंकार ) में आत्माभिमान न करें । अहंकार के त्यागने पर अवशिष्ट अनिर्दरूप अंश है, वही अहं शब्द से लक्षित ब्रह्म है, इस प्रकार वह जाना जाता है । यदि अहम् में आत्माभिमान नहीं करना है, तो 'अहम् ब्रह्म' श्रुति वैसा निर्देश क्यों कर रही है ? इसका उत्तर तो यह है कि 'अहं ब्रह्म' में जो अहंकार का उल्लेख है, वह भूतपूर्व गति के कारण है । अर्थात् 'भूता सञ्जाता पूर्वमविद्याव- स्थायाम्' अविद्यावस्था में 'अहमात्मा' इस प्रकार जो गति (बुद्धि) हुई थी, यानी ब्रह्मज्ञान होने के पूर्व अविद्यादशा में 'अहमात्मा' अहंकार को ही आत्मा समझ रहे थे, इस दृढ़ परिचय के कारण ही अब वाक्यार्थज्ञान के समय भी अहम् का उल्लेख किया गया है । अहंकार से लक्षित जो वस्तु है, उसका साक्षी 'अहम्' मैं—इस प्रकार श्रुति उल्लेख कर रही है ॥ ६ ॥ ॥ इति षष्ठं विशेषापोहप्रकरणं समाप्तम् ॥