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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणम् सूक्ष्मताव्यापिते ज्ञेये गन्धादेरुत्तरोत्तरम् । प्रत्यगात्मावसानेषु पूर्वपूर्वप्रहाणतः ॥१॥ सूक्ष्मतेति—गन्धादि से लेकर पूर्व-पूर्व कार्य का त्याग करते हुए प्रत्यगात्मा तक उत्तरोत्तर कारणतत्त्व की सूक्ष्मता और व्यापकता समझनी चाहिये ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी जिस ब्रह्मरूप प्रत्यगात्मा की मुक्ति, वेदान्तवाक्योत्पन्न ज्ञान से अज्ञाननिवृत्ति कराते हुए बताई गयी है, वह सर्वान्तर (सबके भीतर) होने से उसकी निरतिशय सूक्ष्मता और व्यापिता इसी ग्रन्थ के अष्टम प्रकरण के तृतीय श्लोक में 'यथा च खम्' आदि के द्वारा सूचित की गई है, उसी का उपपादन करने के लिए इस प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है। यहाँ 'गन्ध' का अर्थ पृथिवी है। गन्ध (पृथिवी) से लेकर प्रत्यगात्मा तक जितने पदार्थ हैं, उनमें से पूर्व-पूर्व का त्याग करने से उत्तर-उत्तर भाग में सूक्ष्मता और व्यापिता होती है। एवं च सर्वान्तरभाग में स्थित प्रत्यगात्मा में निरतिशय सूक्ष्मता सिद्ध होती है। कार्य में कारणस्वरूप के रहने पर भी वह कार्य के आकार से तिरोहित रहने से स्वरूपतः उसका भान नहीं होता इसलिए उसे सूक्ष्म कहते हैं। कार्य के परिमाण से न्यूनपरिमाण होने के कारण 'सूक्ष्म' नहीं कहा जाता। तथा समस्त स्वविकारों में जो अनुगत रहता है, उसी को उपादान कारण कहते हैं। एवं च कार्य की अपेक्षा कारण अधिकदेशवृत्ति होने से उसे व्यापक कहा जाता है। और कार्य न्यूनदेशवृत्ति होने से उसे व्याप्य कहते हैं। एवं च पृथिवी स्वकार्य की अपेक्षा सूक्ष्म और व्यापक है। जल पृथिवी की अपेक्षा सूक्ष्म और व्यापक है। तेज जल की अपेक्षा सूक्ष्म और व्यापक है। वायु तेज की अपेक्षा सूक्ष्म और व्यापक है। वायु आकाश से ग्रस्त है, यह प्रसिद्ध ही है। सत्ता और स्फूर्ति से व्याप्त हुए इन सब का अनुभव होता है, अतः सब का उपादान सच्चित् ही है। उसका उपादान कोई नहीं है। अतः उसी की निरपेक्षव्यापकता और निरतिशयसूक्ष्मता है। यह समस्त दृश्यराशि सच्चिन्मात्र से ग्रस्त रहने के कारण उससे पृथक् कोई भी वस्तु नहीं है। इसलिए उसी की परमसूक्ष्मता और व्यापिता का निश्चय कर 'वह असङ्ग, कूटस्थ, अद्वय मैं हूँ' ऐसा चिन्तन सदा करते रहना चाहिए ॥ १ ॥ शारीरा पृथिवी तावद्यावद्वाह्या प्रमाणतः । १अम्ब्वादीनि च तत्त्वानि तावज्ज्ञेयानि कृत्स्नशः ॥२॥ शारीरेति—बाह्य पृथिवी का जितना प्रमाण है, उतना ही प्रमाण शरीरसम्बन्धिनी पृथिवी का भी है, उसी प्रमाण में जलादि तत्त्वों को भी समझना चाहिये, अर्थात् वे भी बाह्य जलादि के अनुसार उत्तरोत्तर सूक्ष्मतर और व्यापक हैं ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्निर्दिष्ट आत्मस्वरूप का ज्ञान ऊपर किये गये वर्णन के अनुसार होना कठिन है, क्योंकि अध्यात्म और अधिदैवत में भिन्न-भिन्न पृथिवी है। जितना परिमाण (प्रमाण) बाह्य पृथिवी का है, उतना ही शारीरा (अध्यात्म) पृथिवी का परिमाण समझना चाहिये। उसी तरह जल आदि चारों भूतों का भी उतना-उतना ही परिमाण जानना चाहिये, जितना शारीरा और बाह्या पृथिवी का हो। निष्कर्ष यह है कि अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव रूप में विभक्त हुए पृथिवी आदि सब एक ही अज्ञान से विजृम्भित (उत्पन्न) हैं। अतः सब का प्रविलापन एक ही प्रयत्न से हो सकता है। सबमें प्रत्यक्तत्त्व एक-सा अनुगत है, अतः सबका प्रत्यगात्मा में विलीन होना ही उनका अध्यात्मादिरूप है, उसी से वे सब व्याप्त हैं, उससे कोई पृथक् नहीं है, इस रीति से प्रत्यक्तत्त्व का अवधारण करने पर बाह्य, आध्या- १. अनादी०—पाठान्तरम् ।