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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणम् ३७ त्मिक आदि भेद के स्फुरण के लिए कोई अवसर ही नहीं रहता, केवल प्रत्यगात्म-ब्रह्म ही अवशिष्ट रहता है। अतः पूर्व कही गई आत्मतत्त्वज्ञान की सिद्धि अवश्य ही होती है॥ २॥ वाय्वादीनां यथोत्पत्तेः पूर्वं खं सर्वगं तथा। अहमेकः सदा १शुद्धश्चिन्मात्रः सर्वगोऽद्वयः ॥३॥ वाय्वादीनामिति—जिस प्रकार वायु आदि की उत्पत्ति से पूर्व सर्वगत आकाश ही था, उसी प्रकार 'मैं' (आत्मा) एक, सर्वदा, शुद्ध, या सर्वस्वरूप, चिन्मात्र, सर्वत्र व्याप्त एवं अद्वितीय हूँ ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में अध्यात्म-अधिदैवत ज्ञान की प्रत्यगात्मावसानता बताई किन्तु वह कैसे संभव हो सकेगी ? क्योंकि पराचीन विकार (बाह्य पदार्थ) की अपेक्षा, प्रत्यक्त्व को रहती है। अर्थात् 'बाह्य और अन्तः' दोनों शब्द परस्पर- साकांक्ष हैं। अतः परागर्थ (बाह्य पदार्थ) के अभाव में (न रहने पर) आत्मा से प्रत्यक्त्व (भीतरीपना) और सर्वगतत्व का होना कैसे संभव होगा ? अर्थात् पराक् (बाह्य) पदार्थों की प्रत्यगात्मावसायिता कैसे कही जा रही है ? प्रत्यगादि शब्द लक्षणा के द्वारा अपूर्वादिलक्षण चिन्मात्रस्वरूप को ही बताते हैं। लक्षणा करते समय आरोपित पराक् अर्थ की अपेक्षा रहने पर भी चिन्मात्रस्वरूप को तो किसी की भी अपेक्षा नहीं रहती, अतः सबका प्रत्यगात्मा में अवसान (पर्यवसान) होना जो बताया गया है, वह उचित ही है। इसी अभिप्राय को ग्रन्थकार ने वायु के दृष्टान्त से समझाया है। एवंच अध्यात्मादि ज्ञान का प्रत्यगात्मा में अवसान होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३ ॥ ब्रह्माद्याः स्थावरान्ता ये प्राणिनो मम पूः स्मृताः। कामक्रोधादयो दोषा जायेरन्मे कुतोऽन्यतः ॥४॥ ब्रह्माद्या इति—ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक जितने भी प्राणी हैं, वे सब मेरे ही शरीर कहे गये हैं। ऐसी स्थिति में किसी अन्य के द्वारा मुझमें काम-क्रोधादि दोष कैसे उत्पन्न हो सकेंगे ? ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी जिज्ञासा यह होती है कि जब आकाश की तरह एक ही आत्मा है तब उसे सर्वात्मा कैसे कह सकते हैं ? अर्थात् प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न आत्मा के होने का सभी को अनुभव है, इसलिए 'आत्मा' को एक कहना उचित नहीं है। अपितु ब्रह्मादि भेद से 'आत्मा' को अनेक कहना ही उचित प्रतीत होता है। उसी तरह 'तुम (आत्मा) चिन्मात्र हो' यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि राग-द्वेषादि दोषों के संसर्ग की उपलब्धि होती है। इस जिज्ञासा का समाधान यह है कि समस्त भुवनों के सम्पूर्ण प्राणी मुझ चिदात्मा के ही शरीर (पूः) हैं, यह निर्णय कर दिया गया है। उसी तरह काम-क्रोधादि दोष मेरे (आत्मा के) स्वाभाविक नहीं हैं, क्योंकि व्यभिचार दिखाई देता है। परतः (किसी दूसरे से) मुझ आत्मा में वे प्राप्त होते हों, यह कहना भी ठीक न होगा, क्योंकि मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा है ही नहीं ॥ ४ ॥ भूतदोषैः सदाऽस्पृष्टं सर्वभूतस्थमीश्वरम् । नीलं व्योम यथा बालो दुष्टं मां वोक्षते जनः ॥५॥ भूतदोषैरिति—जो भूतों के दोषों से हमेशा अस्पृष्ट है, उस समस्त भूतों के अन्तर्यामी मुझ ईश्वर को लोग उसी प्रकार दोषयुक्त देखते हैं—जैसे बालक आकाश को नीलवर्ण से युक्त देखते हैं ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी जबकि प्रत्यगात्मा में संसार के दोष प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं तब उसकी निर्दोषता कैसे कही जा सकती है ? आकाश की कृष्णता का प्रत्यक्ष जैसे भ्रम है वैसे ही आत्मा में दोषदर्शन भी भ्रम है। समस्त भूतों में मैं स्थित हूँ, १. सर्व०—पाठान्तरम् ।