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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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ईक्षितृत्वप्रकरणम् ईक्षितृत्वं स्वतःसिद्धं जन्तूनां च ततोऽन्यता । अज्ञानादित्यतोऽन्यत्वं सदसीति निवर्त्यते ॥१॥ ईक्षितृत्वमिति—समस्त जीवों का ईक्षितृत्व ( चित्स्वरूपत्व ) स्वभाव से ही सिद्ध है, और उनकी भिन्नता अज्ञानजनित ( उपाधि के कारण ) है । अतः 'तू सत् ( ब्रह्म ) है' इस वाक्य से उनके भेद का निरसन किया गया है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी ब्रह्मात्मैक्यज्ञान से मुक्ति होती है अर्थात् एकमात्र ब्रह्मात्मैक्यज्ञाननिष्ठ व्यक्ति मुक्त होता है, यह जो कहा गया है, वह संगत नहीं हो सकता। क्योंकि ब्रह्म और आत्मा परस्परविरुद्ध स्वभाव के हैं, अतः उन दोनों की एकता होना संभव ही नहीं। मुक्ति तो कर्म से या कर्मसहित ज्ञान से ही हो सकती है। उसी तरह वेदान्त वाक्यों से ही सुनिश्चित (यथार्थ-सम्यक्) ज्ञान हो सकता है—यह कथन भी सन्दिग्ध है, वह ज्ञान तो अनुमानादि प्रमाण से भी हो सकेगा—यदि कोई ऐसी आशंका करे तो उस आशंका के परिहारार्थ इस प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है, और इसके द्वारा 'ज्ञानादेव मुक्तिः' ज्ञान से ही मुक्ति होती है, यह बताया जायगा, और वह ज्ञान, वेदान्त-महावाक्य से ही हो सकेगा, अनुमानादि प्रमाणों से नहीं—यह भी बताया जायेगा । 'त्वं सत् असि' तुम सच्छब्द- लक्षित ब्रह्म ही हो, संसारी नहीं हो—इस वाक्योपदेश से ही सच्छब्दार्थ ब्रह्म और जीव का भेद निवृत्त हो जाता है । तथापि संसारी अशुद्ध जीव में उससे नितान्त विपरीत ब्रह्मत्व की संभावना कैसे कर सकते हैं ? यह आशंका हो सकती है। उस आशंका का निवारण इस प्रकार कर सकते हैं कि समस्त प्राणियों का चिद्रूपत्व ही ईक्षितृत्व है, और वह स्वतः- सिद्ध (स्वाभाविक) है। चिद्रूपत्व की तरह कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि को भी स्वाभाविक नहीं माना जा सकता। अन्यथा स्वरूप में व्यभिचार होगा। क्योंकि कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि चिद्रूप से अन्य ( भिन्न ) है, जो अज्ञानजनित है। एवंच अन्यत्व ( अन्यता ) अज्ञाननिबन्धन ( अज्ञानकारणक ) है, वास्तविक ( पारमार्थिक ) नहीं है; कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि में अज्ञानकल्पितत्व तथा ब्रह्मविपरीतत्व है, और मोक्ष स्वतश्चिन्मात्रस्वभाव ( स्वरूप ) तथा अज्ञान-निवृत्तिलक्षण ( स्वरूप ) है। मोक्ष में केवल तत्त्वज्ञान मात्र की अपेक्षा रहती है, अर्थात् तत्त्वज्ञान की आवश्यकता होती है। अतः 'तत्त्वमसि' महावाक्य के अर्थज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति होने से कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि की भी निवृत्ति हो जाती है। एवञ्च ज्ञान से ही अन्यत्वनिवृत्तिरूप मुक्ति होती है। उसके लिये अन्य साधन खोजने की आवश्यकता नहीं है ॥ १ ॥ एतावद्धचमृतत्वं न किंचिदन्यत्सहायकम् । ज्ञानस्येति ब्रुवच्छास्त्रं सलिङ्गं कर्म बाधते ॥२॥ एतावदिति—यह आत्मज्ञान ही अमृतत्व ( मोक्षप्राप्ति का साधन ) है । इस आत्मज्ञान का कोई और सहायक नहीं है। इस प्रकार कहता हुआ शास्त्र¹ आश्रमोचित यज्ञोपवीतादि लिङ्गों के सहित कर्म का बाध करता है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व कथन के अनुसार यद्यपि ज्ञान से मोक्ष होता है, तथापि वह ज्ञान, कर्मसापेक्ष होकर ही मोक्ष का साधन हो सकता है, कर्मनिरपेक्ष होकर नहीं—ऐसा कुछ लोगों का कहना है, किन्तु वह श्रुति तथा युक्ति के विरुद्ध होने के कारण उचित नहीं है। अतः कर्म को ज्ञान का सहायक मानकर उसे मोक्ष का साधन नहीं माना जा सकता। अद्वैत आत्मज्ञान के होनेपर कर्म के हेतुभूत जात्यादि के अभिमान के अभाव में कर्म की स्थिति ही कहाँ, जो मोक्षफल की प्राप्ति कराने में ज्ञान का सहायक बन सके ? एवंच ज्ञान-कर्मसमुच्चय मोक्षप्राप्ति में कारण नहीं है ॥ २ ॥ १. 'एतावदरे खल्वमृतत्वम्'—( बृ. उ. ४।५।१५ ) अमृतत्व का साधन आत्मज्ञान ही है—इन शब्दों से निश्चयपूर्वक कहनेवाली श्रुति को शास्त्र कहते हैं । ७