उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context५० उपदेशसाहस्री सर्वैषां मनसो वृत्तमविशेषेण पश्यतः । तस्य मे निर्विकारस्य विशेषः स्यात्कथंचन ॥३॥ सर्वेषामिति—सबके अन्तःकरणों की वृत्तियों को सामान्यभाव से देखने वाले उस मुझ निर्विकार आत्मा का कोई विशेषभाव कैसे हो सकता है ? ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकरण के प्रथम श्लोक के द्वारा प्रतिपादित स्वाभाविक चिद्रूपत्व को बताते हुए ज्ञानी के लिये कर्म का होना संगत नहीं हो सकता, यह प्रस्तुत श्लोक के द्वारा बताया जा रहा है। क्योंकि समस्त प्राणियों की मनोवृत्तियों के साक्षी उस आत्मा को जाति आदि का कोई अभिमान नहीं होता है। श्लोक में आये 'विशेष' शब्द का अर्थ कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि तथा शास्त्रविहित कर्म के साधनभूत जात्याद्यभिमान है। 'कथञ्चन' का अर्थ आक्षेप है। अर्थात् किसी प्रकार भी मुझमें विकार नहीं हो सकता, क्योंकि अभिमानशून्य होकर केवल साक्षी बनकर मैं देखता रहता हूँ ॥ ३ ॥ मनोवृत्तं मनश्चैव स्वप्नवज्जाग्रतीक्षितुः । संप्रसादे द्वयासत्त्वाच्चिन्मात्रः सर्वगोऽव्ययः ॥४॥ मन इति—स्वप्न के समान जाग्रत् अवस्था में भी मन और मन की वृत्तियों के साक्षी (ईक्षिता) आत्मा का कोई विशेषभाव कैसे हो सकता है ? किन्तु सुषुप्ति अवस्था में इन दोनों का अभाव होने से सर्वगत, अविनाशी आत्मा चेतनमात्र रह जाता है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह आत्मा सबकी मनोवृत्तियों को समान भाव से (अविशेषेण) किस प्रकार देखता है, यह जिज्ञासा होनेपर दृष्टान्त के साथ उसका उपपादन करते हुए आत्मा की चिदेकरसता को बता रहे हैं। स्वप्नावस्था में बाह्य विषय (पदार्थ) न होने से आत्मा जैसे सवृत्तिक (वृत्तिसहित) मन को ही देखता रहता है, ठीक उसी तरह जाग्रत् अवस्था में भी मनोवृत्ति (मनःप्रचार—मनोवृत्त) और उस वृत्ति के आश्रयभूत मन को आत्मा देखता है, तब उसमें कौनसी विशेषता (विकार) उपलब्ध हो रही है ? अर्थात् कोई नहीं। क्योंकि स्वप्न में जैसे वृत्तिसहित मन के अतिरिक्त आत्मा को कुछ उपलब्ध नहीं होता, वैसे ही जाग्रत् अवस्था में भी उसे विषयाकारवृत्तिविशिष्ट मन के अतिरिक्त कुछ भी उपलब्ध नहीं होता है। यदि कहें कि इस प्रकार का मनोदर्शन ही उस (आत्मा) में स्वाभाविक विशेष (विकार) है, तो यह कथन भी ठीक न होगा, क्योंकि सुषुप्तिदशा में (सम्प्रसाद में) वृत्ति और मन दोनों ही नहीं रहते१, अतः उनका दर्शन भी स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। एवंच आत्मा चिन्मात्र है, सर्वत्र व्याप्त है, अव्यय और अद्वितीय सिद्ध होता है ॥ ४ ॥ स्वप्नः सत्यो यथाऽऽबोधाद्देहात्मत्वं तथैव च । प्रत्यक्षादेः प्रमाणत्वं जाग्रत्स्यादाऽऽत्मवेदनात् ॥५॥ स्वप्न इति—जिस प्रकार जागने तक स्वप्न की सत्यता प्रतीत होती है, उसी प्रकार आत्मज्ञान होने तक ही जाग्रत् अवस्था में देहात्मबुद्धि और प्रत्यक्षादि प्रमाणों का प्रामाण्य समझा जाता है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—पूर्वप्रतिपादन यदि अकाट्य हो तो बाह्याभ्यन्तर द्वैत का अभाव स्वीकार करना ही होगा, किन्तु प्रत्यक्षादि प्रमाणों के साथ विरोध होने से तथा लौकिक-वैदिक समस्त व्यवहारों का लोपप्रसंग प्राप्त होने से पूर्वप्रतिपादन उचित नहीं प्रतीत होता। समा०—जैसे जागने तक स्वप्न सत्य अर्थात् लौकिक-वैदिक व्यवहार के योग्य प्रतीत होता है, उसी तरह जाग्रत् अवस्था में भी देहात्मबुद्धि और प्रत्यक्षादि प्रमाणों का प्रामाण्य सम्पूर्ण व्यवहारों का अंग (साधन-उपाय) माना १. 'न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ।'—(बृ. उ. ४।३।२३)