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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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५२ उपदेशसाहस्री समा०—शास्त्र कभी विरुद्धार्थ का प्रतिपादन नहीं करता । शास्त्र के अर्थ को जो विरुद्ध समझते हैं, वे वस्तुतः कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्ड से बहिर्मुख ही हैं, इसलिए उन्हें नास्तिक ही समझना चाहिए । वे सभी पुरुषार्थों के अयोग्य हैं ॥ ८ ॥ धर्माधर्मफलैर्योग इष्टोऽदृष्टो यथाऽऽत्मनः । शास्त्राद्ब्रह्मत्वमप्यस्य मोक्षो ज्ञानात्तथेष्यताम् ॥९॥ धर्मेति—किसी अन्य प्रमाण से सिद्ध न होनेपर भी मीमांसा शास्त्र के आधार पर ही आत्मा का धर्माधर्म- रूप फलों [ पुण्य-पाप रूप फलों ] से सम्बन्ध स्वीकार किया जाता है, वैसे ही शास्त्र-प्रमाण [ वेदान्त शास्त्र के आधार पर ] से आत्मा का ब्रह्मत्व और ज्ञान से उसका मोक्ष भी स्वीकार करना चाहिये ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—दूसरों को नास्तिक कह देने मात्र से अद्वैत का सिद्धांत स्थिर नहीं किया जा सकता । अद्वैत की सिद्धि में कोई प्रमाण नहीं है, अतः ‘ब्रह्मैवास्मि’ यह ज्ञान नहीं हो सकता । अद्वैत को सिद्ध करने के लिए जो तादात्म्य- श्रुतियाँ उपस्थित की जाती हैं, वे सब अन्यपरक होने से उपपन्न हो जाती हैं । समा०—शास्त्र के तत्त्वार्थ को जाननेवाले विद्वान् किन्हीं अन्यान्य प्रमाणों (प्रत्यक्षानुमानादि प्रमाणों) से सिद्ध (प्रमित) न होते हुए भी जैसे केवल एकमात्र शास्त्रप्रमाण¹ के आधार पर ही आत्मा का सुख-दुःखादिरूप धर्मा- धर्मफलों के साथ सम्बन्ध मान लेते हैं, उसी तरह वे विद्वान् वेदान्तशास्त्र² के आधार पर आत्मा में ब्रह्मत्व (आत्मा को ब्रह्म) और उसका ज्ञान से ही मोक्ष स्वीकार कर लें । क्योंकि शास्त्रत्वेन दोनों समान रूप से प्रमाण हैं । एवं च भेद और कर्म दोनों निन्दित होने से उन दोनों में शास्त्र का तात्पर्य नहीं है । अतः शास्त्र का अनुसरण करनेवाले विद्वान् यथाशास्त्र ही अर्थ समझने का प्रयास करें । अतः ‘तत्त्वमसि’ वाक्य से आत्मा को ब्रह्म, अर्थात् आत्मा में ब्रह्मत्व के ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति, उससे ब्रह्मरूप में ही उसकी स्थिति और मोक्ष (कैवल्य) समझना चाहिये ॥ ९ ॥ या माहार्जनाद्यास्ता वासनाः स्वप्नदर्शिभिः । अनुभूयन्त एवेह ततोऽन्यः केवलो दृशिः ॥१०॥ या इति—हरिद्रा [ हल्दी ] से रंगे हुए वस्त्रादि के समान जाग्रत् दशा की वासनाएँ होती हैं, उन्हीं का स्वप्न देखने वाले पुरुष उनका अनुभव करते रहते हैं, वास्तव में उनकी सत्ता नहीं रहती । उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में भी शुद्ध साक्षीमात्र आत्मा उस विषयदर्शी जीव से सर्वदा भिन्न रहता है ॥ १० ॥ हृदयस्पर्शिनी समुच्चयवादी कह सकता है कि हमारे शास्त्र ने आत्मा के साथ जो धर्माधर्म का सम्बन्ध माना है, वह किसी प्रमाणान्तर से विरुद्ध न होने के कारण उचित ही है, किन्तु आत्मा का अकर्तृत्व, अभोक्तृत्व आदि उसके प्रत्यक्ष प्रतीत होनेवाले कर्तृत्व-भोक्तृत्व से विरुद्ध हैं, इस कारण वेदान्तियों का कहना ठीक नहीं है । अतः शास्त्र और अनुभव का समन्वय (अविरोध) करने के लिये हमें भेदाभेदवाद का स्वीकार कर लेना चाहिये । किन्तु उसका यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मा में कर्तृत्व आदि का जो प्रतिभास होता है, वह वास्तविक न होकर केवल अध्यास मात्र है । अतः श्रुत्युक्त अद्वैत का प्रतिपक्षी कोई न होने से निर्विरोध अद्वैत सिद्ध हो जाता है । स्वप्नावस्था में लिङ्ग के आश्रित रहनेवाली³ श्रुतिसिद्ध वासनाएँ ही स्वप्नदर्शियों के द्वारा देखी जाती हैं । महारजन (हरिद्रा) से रञ्जित वस्त्रादि को ‘माहारजन’ कहते हैं । स्वप्नावस्था में वात-पित्त-श्लेष्म से दूषित हुए रस से परिपूर्ण हुईं नाड़ियों में अनुगत (प्रविष्ट) हुए जाग्रद्वासनावासित मन की अनेक वासनाएँ अदृष्टादि के द्वारा उद्बुद्ध (जागरित) होती हैं, उस कारण जाग्रत् अवस्था में दृष्ट अर्थ (पदार्थ) के आकार में परिणत हुआ वह १. ‘पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन’— (बृ. उ. ३।२।१३) २. ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’—( मुं. उ. ३।२।९ ), ‘तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’—( श्वे. उ. ३।८, ६।१५) ३. ‘तस्यहैतस्य पुरुषस्य रूपं । यथा माहारजनं वासः’ इत्यारभ्य ‘यथाऽसकृद्विद्युत्तम्’ इत्यन्तेन श्रुत्युक्ता वासनाः । (बृ. उ. २।३।६)