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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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ईक्षितृत्वप्रकरणम् ५३ मन हरिद्रारञ्जित पटादि के रूप के समान भासित होने लगता है और स्वप्नद्रष्टा के द्वारा उसकी उपलब्धि द्रष्टा, दृश्य, दर्शन एवं तत्करणादि के रूप में नित्य हुआ करती है। अतः स्वप्न में दिखाई पड़नेवाली माहारजन (पीतवस्त्र) आदि के समान लिङ्गात्मा (मन-बुद्धि) के सहित वासनाओं की अपेक्षा दृशिस्वरूप द्रष्टा आत्मा विलक्षण ही प्रतीत होता है। उसी तरह जाग्रत् अवस्था में कर्तृत्ववादि भी दृश्य होने के कारण अनात्मधर्म ही हैं, यह निश्चित होता है। अतः कर्तृत्वादि धर्मवाले लिङ्ग (मन-बुद्धि) से दृशिस्वरूप केवल शुद्ध आत्मा कोई अन्य ही है ॥ १० ॥ कोशादिव विनिष्कृष्टः कार्यकारणवर्जितः । यथाऽसिर्दृश्यते स्वप्ने तद्वद्बोद्धा स्वयंप्रभः ॥११॥ कोशादिति—जिस प्रकार कोश से निकाला खड्ग् उस कोश से पृथक् [ भिन्न ] दिखलाई देता है, उसी प्रकार स्वप्नावस्था में स्वयंप्रकाश बोद्धा भी कार्य-कारणाकार मन से पृथक् ही रहता है ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की स्वप्नावस्था में दृश्य की अपेक्षा विलक्षण (पृथक्) प्रतीति होती है। जैसे खड्ग (असि) कोश (म्यान) से अलग करने पर (निकालनेपर) अपने स्वरूप में दिखाई देता है, उसी तरह कार्य-कारणवर्जित अर्थात् कार्य- कारणाकार लिङ्गात्मक मन से पृथक् बोद्धा आत्मा स्वप्न में यथावत् दिखाई देता है। 'दृश्यते' दिखाई देता है—कहने से उसे (आत्मा को) दृश्य विषयों के समान मिथ्या नहीं समझना चाहिये, क्योंकि वह स्वयंप्रभ है। वह अपनी महिमा से ही प्रकाशित रहता है, विषय की तरह प्रकाशित किया नहीं जाता। अथवा¹ श्रुति के द्वारा निर्णीत होने से कार्य- कारणवर्जित आत्मा का स्वप्न में ज्ञान होता है। एवं च कोशनिष्कृष्ट असि की तरह आत्मा भी स्वप्नसंस्काराश्रय सूक्ष्म देह से विलक्षण दिखाई देता है। उपाधि से पृथक् अपने स्वरूप में ही उसका अवभास होता है, इसी अभिप्राय को प्रदर्शित करने में 'असि' का दृष्टान्त दिया गया है ॥ ११ ॥ आपेषात्प्रतिबुद्धस्य ज्ञस्य स्वाभाविकं पदम् । उक्तं नेत्यादिवाक्येन कल्पितस्यापनेतृणा ॥१२॥ आपेषादिति—कल्पित प्रपञ्च का बाध करने वाले 'नेति नेति' आदि वाक्य ने हाथ दबाने से जगे हुए चेतन आत्मा का स्वाभाविक रूप बताया है ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका— आत्मा को जो स्वयंप्रकाश कहा गया है, वह कैसे संभव हो सकता है, क्योंकि वह तो ब्रह्म से विलक्षण (भिन्न) है। समा०— श्रुतिविरोध होने के कारण ऐसी शंका करना ठीक नहीं है। आत्मा में कर्तृत्वादि की जो प्रतीति होती है, वह स्वप्नप्रतीति की तरह मिथ्या होने से आत्मा शुद्ध ही है अर्थात् ब्रह्म ही है, यह शास्त्र बता रहा है, अतः निर्विरोध यह जाना जा सकता है। एवं च भेदाऽभेद की कल्पना कर अपने मन को कलुषित करना उचित नहीं है। ²श्रुति कहती है कि प्राण के अनेक नाम पुकारने पर भी वह आत्मा प्रबुद्ध नहीं हो पाया किन्तु हाथ से दबाते ही वह जाग उठा, इससे स्पष्ट होता है कि प्राण-इन्द्रियस्वरूप लिङ्गसमुदाय से विलक्षण (भिन्न) और स्थूल संघात (समुदाय) से भी विलक्षण (भिन्न) ही आत्मा है। अतएव अर्थात् समस्त जड़ पदार्थों से विलक्षण होने के कारण ही वह (आत्मा) ज्ञानस्वभाव (स्वरूप) है। पाणि (कर—हाथ) स्पर्श से प्रतिबुद्ध हुए त्वंपदार्थ 'ज्ञ' का परब्रह्मरूप स्वाभाविक पद, कल्पित (अध्यस्त) मूर्त-अमूर्त-तद्वासनाश्रयरूप के निषेधक 'नेति' वाक्य से³ कहा गया है। 'नेति नेति' ऐसी वीप्सा (द्विरुक्ति) के द्वारा यह बताया गया है कि समस्त कारण-कार्यात्मक उपाधि का प्रतिषेध कर 'अखण्ड ब्रह्म' में 'नेति' वाक्य का तात्पर्य है। एवं च श्रुतिविरोध होने से आत्मा को ब्रह्म से विलक्षण समझना ठीक नहीं है ॥ १२ ॥ १. 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः'—( बृ. उ. ४।३।९ ) २. 'तं पाणिनाऽऽपेषं बोधयाञ्चकार स होत्तस्थौ' इत्यारभ्य 'स होत्तस्थौ' 'बृहत्पाण्डरवासः सोम राजन्'……( बृ. उ. २।१।१५ ) ३. 'अथात आदेशो नेति नेति' इत्यारभ्य 'सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्'—इत्यन्तेन वाक्येन ।—(बृ. उ. २।३।६)