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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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प्रकाशप्रकरणम् प्रकाशस्थं यथा देहं सालोकमभिमन्यते । द्रष्ट्राभासं तथा चित्तं द्रष्टाहमितिम॑न्यते ॥१॥ प्रकाशस्थमिति—जिस प्रकार प्रकाश में स्थित स्थूल देह को लोग प्रकाश से युक्त समझते हैं, उसी प्रकार साक्षी [द्रष्टा] आत्मा से प्रकाशित हुए चित्त को ही वे लोग साक्षी समझते हैं, अर्थात् 'चित्त' को ही 'मैं साक्षी हूँ' ऐसा कहते हैं ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—इस भोक्ता आत्मा को यदि 'निर्विशेष' रूप में स्वीकार करते हैं तो उसका उसी रूप में (निर्विशेष) अनुभव क्यों नहीं होता ? अर्थात् यदि 'प्रिय' शब्द से कहा हुआ आत्मा ही ब्रह्म है, तो सब लोग जिस प्रकार आत्मा को अहंरूप से अनुभव करते हैं, उस प्रकार ब्रह्म को क्यों नहीं करते ? समा०—ब्रह्म यद्यपि कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि से शून्य (रहित) है, तथापि लोगों को विवेक न हो पाने से (अविवेक से) उसका वैसा अनुभव नहीं हो पाता । जिस प्रकार प्रकाश सामान्यरूप से सर्वत्र व्याप्त है, परन्तु वह किसी स्थूल शरीर से युक्त होने पर तदाकार लगने लगता है, उसी प्रकार सर्वत्र समानरूप से व्याप्त निर्विशेष चैतन्य, अन्तःकरण में व्याप्त रहने से अन्तःकरणाकार (अन्तःकरणरूप) प्रतीत होने लगता है । और उस चिदाभासविशिष्ट अन्तःकरण को ही लोग 'आत्मा' कहने लगते हैं । एवंच 'अहं' रूप से जिस आत्मा का हम अनुभव करते हैं, वह अविवेक के कारण करते हैं । वास्तव में तो आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है । शंका करनेवाले का अभिप्राय यह था कि यदि भोक्ता, जिसे 'प्रिय' शब्द से कहा जाता है, (वह) निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप ही है, तो सब लोग 'अहं अह॑', इस प्रकार आत्मा का अनुभव तो करते हैं, 'ब्रह्म अहम्' ऐसा अनुभव क्यों नहीं करते ? उक्त शंका का समाधान यही है कि पदार्थतत्त्व-परिशोधनाभावरूप अपराध के कारण ही 'ब्रह्म अहम्' ऐसा अनुभव नहीं कर पाते । अर्थात् साभास अन्तःकरण को न पहिचानने के कारण (साभास अन्तःकरण का विवेक न होने के कारण) यथार्थ रूप से अपनी आत्मा को (आत्मा के यथार्थ रूप को) नहीं जान पाते । अतः इस प्रकरण में मुख्यतया (प्राधान्येन) 'तत्-त्वम्' पदार्थ का शोधन बताया जा रहा है । वास्तव में आत्मा अनवच्छिन्न, प्रकाशरूप है, तथापि अन्तःकरण के सम्पर्क से अन्तःकरणाकाराकारित हुआ भासने लगता है । इस कारण 'अहं कर्ता, अहं भोक्ता' इस प्रकार अन्तःकरणस्वभावविशिष्ट (अन्तःकरणाकाराकारित) को ही 'आत्मा' समझते हैं, शुद्ध आत्मा को नहीं जान पाते ॥ १ ॥ यदेव दृश्यते लोके तेनाभिन्नत्वमात्मनः । प्रपद्यते ततो मूढस्तेनात्मानं न विन्दति ॥२॥ यदेवेति—लोकव्यवहार में [प्राण से लेकर स्थूल देह तक] जो कुछ दिखाई देता है, उसी से आत्मा का तादात्म्य हो जाता है । अतः अज्ञानी व्यक्ति को आत्मा का यथार्थ रूप से ज्ञान नहीं हो पाता ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में यह बताया था कि आत्मा के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान न होने में साभास अन्तःकरण का अविवेक ही कारण है, और उसी के माध्यम से देह तक अविवेक चलता रहता है, जिससे आत्मा के यथार्थ स्वरूप की प्रतिपत्ति (ज्ञान) नहीं हो पाती । अर्थात् लोकव्यवहार में प्राण से लेकर स्थूलदेह तक जो अहंकारास्पद है, वह सब साभासचित्त से अविविक्तरूप में अनुभूत होता है । उस कारण प्राण से देह तक सबकी आत्मरूप में प्रतीति होती है । अर्थात् ये सब आत्मा से अभिन्न (आत्मा ही) प्रतीत होते हैं । तात्पर्य यह है कि देह आदि और आत्मा इनका परस्पर एक दूसरे में अध्यास करते रहने की मूर्खता के कारण यह मूढ मनुष्य आत्मा को ब्रह्मरूप से नहीं जानता ॥ २ ॥