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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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प्रकाशप्रकरणम् ५७ दशमस्य नवात्मत्वप्रतिपत्तिवदात्मनः । दृश्येषु तद्वदेवायं मूढो लोको न चान्यथा ॥३॥ दशमस्येति—दशम आत्मा को नवम समझने के समान यह संसार बुद्धि आदि दृश्य वर्ग में मोहित हो रहा है । इसके विपरीत अनुभव नहीं करता ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी एक बार दस विद्यार्थियों ने नदी के पार पहुँचकर, यह जानने के लिए कि हममें से कोई बह तो नहीं गया, आपस में गिनना आरंभ किया । उनमें से जो भी गिनना आरंभ करता वह अपने को छोड़कर शेष नौ को गिन जाता, इस श्रुतिप्रसिद्धि के समान जिस प्रकार विद्यार्थी दशमरूप अपने को भूलकर अपने को नौ से भिन्न नहीं देख पाते थे, उसी प्रकार बुद्धि आदि दृश्यवर्ग में मोहित हुए लोग अपने को बुद्धि आदि से असंग अनुभव नहीं कर पाते । क्योंकि आचार्योपदेश से हीन होने के कारण दृश्य पदार्थों में आत्मतादात्म्य प्रतिपत्ति बनी रहती है, उस कारण अपनी आत्मा को अन्यथा ही समझते रहते हैं। अर्थात् बुद्ध्यादि दृश्यवर्ग का अपोह (त्याग) करके 'ब्रह्मास्मि' इसप्रकार उसकी यथार्थरूपता (स्वरूपयाथात्म्य) को नहीं जान पाते ॥ ३ ॥ त्वं कुरु त्वं तदेवेति प्रत्ययावैककालिकौ । एकनीडौ कथं स्यातां विरुद्धौ न्यायतो वद ॥४॥ त्वमिति—'तू यज्ञ आदि का अनुष्ठान कर' और 'तू वही [ब्रह्म ही] है' इस प्रकार के दो विरुद्ध ज्ञान एक ही समय एक आश्रय में कैसे रह सकते हैं ? यह युक्ति के द्वारा बतलाओ ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी एक ही चेतन का कर्त्ता-भोक्ता होना तथा कर्ता-भोक्ता न होना अर्थात् शुद्ध ब्रह्मरूप होना संभव नहीं । अतः यह कहना कि प्रत्यक्ष अनुभव और श्रुति के अविरोध के लिए प्रत्यगात्मा को ही कर्त्ता-भोक्ता तथा ब्रह्मरूप मान लिया जाय, अर्थात् प्रत्यगात्मा में ही कर्तृत्वादि धर्मवत्त्व और ब्रह्मरूपत्व रहे, अविवेक की कल्पना कर उसे मूढ़ कहने की क्या आवश्यकता ? अथवा शास्त्रोपदेश या आचार्योपदेश से हीन होने के कारण बुद्ध्यादि दृश्य पदार्थों के विपरीत आत्मयाथात्म्य (आत्मा के यथार्थ रूप) को नहीं जान पाता, अतः पदार्थ (जड़-चेतन) का विवेक न होने से उसका मोक्ष होना संभव नहीं रहता, यह बताया गया था। तब यह आशंका होती है कि पदार्थ- विवेक (जड़-चेतन पदार्थ के भेदज्ञान) की क्या आवश्यकता ? शास्त्र से आत्मा की ब्रह्मरूपता के ज्ञात होनेपर 'ब्रह्माहमस्मि' इस प्रकार प्रसंख्यान (ज्ञान) होने से ही आत्मा के याथात्म्य का आपरोक्ष्य (प्रत्यक्ष) हो जाने के कारण मोक्ष का होना संभव हो सकता है। अतः यह प्रसंख्यानविधि का अवसर है, पदार्थविवेक का नहीं—यह आशंका हो सकती है, किन्तु एक विषय (एक नीडि) में एककालिक दो विरुद्ध प्रत्यय कैसे हो सकते हैं? अतः श्रुति ने जो जीव के लिए अग्निहोत्रादि कर्मों की अवश्यकर्तव्यता का विधान किया है, वह उसके लोकप्रसिद्ध कर्तृत्व को स्वीकार करके केवल अज्ञानावस्था में ही है । ज्ञानवान् तथा जिज्ञासु के लिए तो उसके शुद्ध स्वरूप का ही निरूपण किया गया है। अतः वास्तव में आत्मा के कर्तृत्व आदि का बाध करना ही श्रुति को अभीष्ट है। अर्थात् एक ही आत्मा के लिये 'कुरु, और तदेव त्वम्' = करो और वही तुम हो, इस प्रकार कर्तृत्व और अकर्तृत्व प्रकारक और समसामयिक (एक- कालिक) विरुद्ध ज्ञान का कराना उसी प्रकार होगा, जैसे एक ही पदार्थ में शीत और उष्ण का ज्ञान कराना। अतः परस्पर विरुद्ध दो ज्ञानों में से किसी एक के द्वारा किसी एक का बाध अवश्य करना ही होगा, क्योंकि एक ही वस्तु में दो परस्पर विरुद्ध ज्ञानों को प्रमाण नहीं माना जा सकता ॥ ४ ॥ देहाभिमानिनो दुःखं नादेहस्य स्वभावतः । स्वापवृत्तप्रहाणाय तत्त्वमित्युच्यते दृशेः ॥५॥ देहेति—यदि कहें कि आत्मा का दुःखी होना या सुखी होना आदि का सभी को प्रत्यक्ष अनुभव है, अतः प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर श्रुतिप्रतिपादित निर्दुःखत्व (दुःखशून्यता) का ज्ञान ही बाधित होता है—ऐसा क्यों न कहा ८