उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context६६ उपदेशसाहस्री नित्येति—इसी प्रकार मुझ नित्यमुक्त, शुद्ध, कूटस्थ, अविचल, अमृतस्वरूप, अविनाशी और अशरीरी में [विद्या, अविद्या नहीं है, इस प्रकार पूर्व श्लोक से सम्बन्ध है ] ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वप्रतिपादित धर्मों का आत्मा में अभाव होने से उसकी शुद्धता बताई गई थी, एवं च उसकी शुद्धता में ‘अशरीरत्व’ को ही हेतु कहना होगा। इसी अभिप्राय से आत्मा के चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप को अनेक विशेषणों से स्पष्ट कर रहे हैं। इन सब विशेषणों से विशिष्ट आत्मा में विद्या-अविद्या नहीं है, ऐसा अन्वय पूर्व श्लोक के साथ लगाना चाहिये। आत्मा की नित्यता में ‘शुद्धत्व’ हेतु है, उसकी कूटस्थता में ‘अविचालित्त्व’ हेतु है, उसके अमृतत्व में ‘अक्षरत्व’ हेतु है। इस प्रकार विशेषणों को लगाना चाहिये। उक्त तीनों में ‘अशरीरत्व’ हेतु है। क्योंकि शरीर का संबंध हुए बिना उसमें अशुद्धि, चलनक्रिया, क्षरणक्रिया की उपपत्ति नहीं हो सकती। आत्मा तो सर्वदा ही अशरीर होने से वह सर्वदा शुद्ध है ॥ ३ ॥ जिघत्सा वा पिपासा वा शोकमोहौ जरामृतो । न विद्यन्तेऽशरीरत्वाद् व्योमवद्व्यापिनो मम ॥४॥ जिघत्सेति—उक्त विशेषणों के द्वारा प्रतिपादित आत्मा में क्षुत् [भूख], पिपासा [प्यास], शोक, मोह, जरा, मृत्यु भी नहीं है, क्योंकि मैं अशरीर [ शरीर रहित ] तथा आकाश के समान व्यापक हूँ ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा के साथ छह ऊर्मियों (षडूमियों) का सम्बन्ध न रहने से भी उसकी शुद्धता सिद्ध होती है। खादितुमिच्छा = जिघत्सा = खाने की इच्छा, पातुमिच्छा = पिपासा = पीने की इच्छा। 'अशरीरत्वात्' यह उपलक्षण है (सूचक है), अर्थात् अशरीरत्वात् कहने से अप्राणत्वात्, अमनस्त्वात् को भी समझना चाहिये। कहा भी है— 'प्राणस्य क्षुत्पिपासे द्वे मनसः शोकमोहकौ। जरामृत्यू शरीरस्य षडूर्मीरहितः शिवः॥' इति। क्षुत् और पिपासा 'प्राण' के धर्म हैं, शोक और मोह 'मन' के धर्म हैं, जरा और मृत्यु 'शरीर' के धर्म हैं, इन छह विकारों (ऊर्मियों) से रहित 'शिव' है ॥ ४ ॥ अस्पर्शत्वान्न मे स्पृष्टिर्नाजिह्वत्वादरसज्ञता । नित्यविज्ञानरूपस्य ज्ञानाज्ञाने न मे सदा ॥५॥ अस्पर्शत्वादिति—मैं स्पर्शशून्य हूँ इस कारण मुझमें 'स्पर्शगुण' नहीं है, रसनाहीन हूँ, इसलिये मुझमें रसज्ञता नहीं है, तथा नित्य विज्ञानस्वरूप होने के कारण मुझमें सर्वदा ही ज्ञान और अज्ञान का अभाव है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी स्पर्श-रसनसम्बन्धप्रतिषेध, अनुक्त सकल इन्द्रियवृत्तियों के प्रतिषेध का उपलक्षण है। एवंच आविर्भाव- तिरोभाव रहित होने से उसकी विशुद्ध चिद्रूपता कही गई है। एवंच अनिषिद्ध इन्द्रियनिषेध द्वारा उनसे (उन इन्द्रियों से) प्राप्त दृष्टादि विकार का आत्मा में निषेध किया गया है। वह (आत्मा) नित्य विज्ञानरूप होने से उसमें विद्या-अविद्या भी नहीं हैं ॥ ५ ॥ या तु स्यान्मानसी वृत्तिश्चाक्षुषका रूपरञ्जना । नित्यमेवात्मनो दृष्ट्या नित्यया दृश्यते हि सा ॥६॥ यात्विति—चक्षुरिन्द्रिय के द्वारा निर्गत होने वाली रूपविषयिणी जो मानसी वृत्ति है, वह सर्वदा ही आत्मा के नित्य चैतन्य से प्रकाशित होती है ॥ ६ ॥