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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् ६७ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में दृष्टि आदि नहीं होते हैं, यह पहले बताया गया है, उसी में उपपत्ति दे रहे हैं—इन्द्रिय का विषय के साथ सम्बन्ध होने पर अन्तःकरण, विषय के आकार में परिणत हो जाता है। अन्तःकरण के इस परिणाम को ही ‘वृत्ति’ कहते हैं। चक्षुरादि इन्द्रियों से होने वाले समस्त ज्ञान, तत्तदाकार में परिणत हुई अन्तःकरण की वृत्ति से ही होते हैं। वह वृत्ति, आत्मरूप नित्य चैतन्यप्रकाशलक्षण दृष्टि से नित्य ही प्रकाशित होती रहती है। इसका सभी को अनुभव है। अन्तःकरण की दृष्टि, आत्मचैतन्य की दृश्य है ॥ ६ ॥ तथाऽन्येन्द्रिययुक्ता या वृत्तयो विषयाञ्जनाः । स्मृती रागादिरूपा च केवलाऽन्तर्मनस्यपि ॥७॥ तथेति—इसी प्रकार जो अन्यान्य इन्द्रियों से युक्त विषयाकार वृत्तियाँ हैं, तथा जो [इन्द्रियसम्बन्धरहित] केवल मन के भीतर होनेवाली स्मरणात्मिका, रागात्मिका आदि वृत्तियाँ हैं [ वे भी आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित होती हैं ॥७॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व प्रतिपादन के अनुसार यह अनुमान प्रयोग कर सकते हैं कि 'न दृष्ट्यादयः चिदात्मीयाः, तद्दृश्यत्वात्, यो येन दृश्यते न स तदीयः, यथा रूपादिः ।' इससे यह सिद्ध होता है कि आत्मा दृष्टि आदि विकारों से रहित होने के कारण उसमें शुद्धता है, इसी अभिप्राय से नेत्रद्वारक वृत्ति में कहे गये न्याय का अतिदेश अन्य वृत्तियों में कर रहे हैं। विषयाञ्जना वृत्ति का अर्थ है विषयोपाधिका अर्थात् विषयाकारा वृत्ति। जो स्मृति, राग आदि वृत्ति, चक्षुरादि बाह्येन्द्रियों की अपेक्षा किये बिना ही शरीरान्तर्वर्ती चित्त में हुआ करती है, वह भी पूर्वोक्त आत्मदृष्टि के द्वारा देखी जाती है, अर्थात् प्रकाशित होती है ॥ ७॥ मानस्यस्तद्वदन्यस्य दृश्यन्ते स्वप्नवृत्तयः । द्रष्टुर्दृष्टिस्ततो नित्या शुद्धाऽनन्ता च केवला ॥८॥ मानस्य इति—उसी तरह मन की परिणाम रूप जो स्वप्नवृत्तियाँ हैं, वे भी सबसे भिन्न आत्मा की ही दृश्य हैं, इस कारण द्रष्टा की दृष्टि नित्य, शुद्ध, अनन्त और अन्यसंसर्गरहित [केवल] है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी अभिप्राय यह है कि स्वप्नावस्था में विद्यमान मनःपरिणामरूप जो विषयाकार वृत्तियाँ हैं, वे सब, अपने से भिन्न द्रष्टा की ही दृश्य जिस प्रकार मानी जाती हैं, उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में सभी वृत्तियाँ (दृष्टियाँ) उनसे भिन्न द्रष्टा की दृश्य होती हैं, क्योंकि स्वाप्निक दृश्य एवं जागरित दृश्य दोनों में समान दृश्यता है। समस्त वृत्तियाँ (दृष्टियाँ) कूटस्थदृष्टिभास्य हैं। इससे निष्कर्ष यह निकला कि द्रष्टा की दृष्टि (ज्ञान) नित्य, शुद्ध, अनन्त और संसर्ग- शून्य है। इन्द्रिय का विषय (वस्तु) के साथ संसर्ग होनेपर अन्तःकरण, विषय के आकार में परिणत हो जाता है। अन्तःकरण के इस परिणाम को ही ‘वृत्ति’ कहते हैं। इन्द्रियों से होनेवाले सभी ज्ञान उन-उन आकारों में परिणत हुई अन्तःकरण की वृत्ति से ही होते हैं ॥ ८ ॥ अनित्या साऽविशुद्धेति गृह्यतेऽत्राविवेकतः । सुखी दुःखी तथा चाहं दृश्ययोपाधिभूतया ॥९॥ अनित्येति—उपाधिरूप जो दृश्यदृष्टि है, उसके साथ आत्मदृष्टि का अविवेक रहने से लोग उसे अनित्य और अशुद्ध समझते हैं, उस कारण 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ' ऐसा समझते हैं ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—यदि आत्मदृष्टि ही कूटस्थ है तो उसे अन्यथा (अनित्य, अशुद्ध) क्यों समझा जाता है ?