वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
by महर्षि कणाद
Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)
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Read in contextद्वितीयाऽध्याय १ आह्निक ३५ ( तदनुविधानात् ) उस [ एकत्व ] के साहचर्य से ( एकपृथक्त्वं ) एक पृथक् होना ( च ) भी आकाश का सिद्ध है ( इति ) आह्निक समाप्ति के अर्थ में है ॥ जो पदार्थ एक होता है, वह सब से पृथक् भी होता है, जब आकाश एक है, तत्त्व है, तब वह पृथक् भी है, एक द्रव्य में रहने वाले पृथक्त्व को एकपृथक् समझिये ॥ ३१ ॥ इति द्वितीऽध्यायस्य प्रथममाह्निकम् —*— अथ द्वितीयाऽध्याये द्वितीयमाह्निकम् पूर्वाह्निक में पृथिवी आदि के लक्षण और आकाश तथा शब्द का वर्णन करके, इस द्वितीयाह्निक में उन की परीक्षा की जायगी । उस में प्रथम पृथिवी के लक्षण की परीक्षा करने के लिये यह कहते हैं कि पृथिवी से अन्य किसी द्रव्य का गन्ध गुण नहीं है । यथा- ८०-पुष्पवस्त्रयोः सति संनिकर्षे गुणान्तरा- ऽप्रादुर्भावोवस्त्रे गन्धाऽभावलिङ्गम् ॥ १ ॥ ( पुष्पवस्त्रयोः ) पुष्प और वस्त्र के ( संनिकर्षे ) समीप ( सति ) होने पर ( गुणान्तराऽप्रादुर्भावः ) अन्य गुण का प्रकट न होना ( वस्त्रे ) वस्त्र में ( गन्धाऽभावलिङ्गम् ) गन्ध न होने की पहचान है ॥ जब कभी गन्ध वाले पुष्प और गन्धरहित वस्त्र को एकत्र समीप रख देवें, तब भी वस्त्र में पुष्प के गुण ( गन्ध ) को प्रकट होता नहीं देखते, इस कारण समझना चाहिये कि वस्त्र में गन्ध नहीं । और जो वस्त्र को पुष्पसंसर्ग से कुछ गन्ध वस्त्र में प्रतीत होने लगता है, वह गन्ध आगन्तुक है, अपना निज का नहीं। इसी प्रकार पृथिवी के समीप होने से जिन अन्य वायु आदि में गन्ध प्रतीत होता है वह भी उन वायु आदि का निज गुण नहीं समझना चाहिये, किन्तु पृथिवी के कण उड़ कर वायु में मिल कर गन्ध की प्रतीति कराते हैं, केवल वायु में न सुगन्ध है, न दुर्गन्ध है ॥ १ ॥ ८१-व्यवस्थितः पृथिव्यां गन्धः ॥२॥