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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

by महर्षि कणाद

Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)

DevanagariSanskritpublished160 pages

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ३४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद (पृथिव्यां) पृथिवी में (गन्धः) गन्ध गुण (व्यवस्थितः) ठीक सिद्ध है ॥ २ ॥ ८२-एतेनोष्णता व्याख्याता ॥ ३ ॥ (एतेन) इस से (उष्णता) गरमी (व्याख्याता) व्याख्यात की गई ॥ पृथिवी का स्वाभाविक गन्ध गुण जिस प्रकार अन्य जलादि में सांसर्गिक प्रतीत होता है, इतने से जलादि में गन्ध निज का नहीं सिद्ध होता, इसी बात से उष्णता भी जो अग्नि का स्वाभाविक गुण है, जल वायु में सांसर्गिक समझनी चाहिये ॥ ३ ॥ आगे इसी को स्पष्ट करके कहते हैं:- ८३-तेजस उष्णता ॥ ४ ॥ (तेजसः) अग्नि तत्त्व की (उष्णता) गरमी है ॥ जैसे पृथिवी में गन्ध स्वाभाविक व्यवस्थित है, इसी प्रकार अग्नि में उष्णता व्यवस्थित है, अन्य जल वायु आदि भी उष्ण वा गर्म पाये जाते हैं सो वे अग्नि के संसर्ग से गर्म होते हैं; अपने निजगुण से नहीं ॥ ४ ॥ इसी प्रकार:- ८४-अप्सु शीतता ॥ ५ ॥ (अप्सु) जलों में (शीतता) ठंडा पन है ॥ जल में ठंडापन व्यवस्थित है। वायु भी ठंडा देखा जाता है, परन्तु वह ठंड उस में जलसंसर्ग की होती है। निज की स्वाभाविक नहीं ॥ ५ ॥ पृथिवी जल तेज वायु के लक्षणों की परीक्षा कह चुके, आगे आकाश के लक्षण शब्द की परीक्षा फिर की जायगी। अभी काल की परीक्षा इस लिये पहले करते हैं कि उस से आकाश की वा शब्द की परीक्षा सुगम हो जायगी। प्रथम तौ काल पदार्थ के होने में उस के चिह्न वा लिङ्ग वा पहचान बताते हैं:- ८५-अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिङ्गानि ॥ ६ ॥ (अपरस्मिन्) परले=अल्पवयस्कादि में (अपरम्) अल्पायुष्क हो का ज्ञान, (युगपत्) एक साथ (चिरम्) देरी से (क्षिप्रम्) शीघ्र (इति) ये (काललिङ्गानि) काल के चिह्न हैं ॥ इधर के में इधर का ज्ञान, उधर के में उधर का ज्ञान, एक साथ में ए साथ का ज्ञान, देरी में देर का ज्ञान, जल्दी में जल्दी का ज्ञान, इस प्रकार CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.