वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
by महर्षि कणाद
Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)
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Read in contextDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ५० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद (भूतपूर्वात्) पहिले हो चुके (च) और (भूतात्) अब होते हुये (भविष्यतः) तथा आगे होने वाले (आदित्यसंयोगात्) सूर्योदय के संयोग से (प्राची) पूर्व दिशा का नाम होगया ॥ जिस दिशा से पहले सूर्य उदय हुआ, अब उदय होता है, आगे उदय होगा, उस दिग्विभाग को पूर्व दिशा कहते हैं। इस सूत्र में भूत=उदित= उदय होकर वर्तमान अर्थ में भूत शब्द है, क्योंकि भूतकालार्थक एक दूसरा शब्द भूतपूर्वात् पड़ा है ॥ १४ ॥ ८४-तथा दक्षिणा प्रतीच्युदीची च ॥ १५ ॥ (तथा) इसी प्रकार (दक्षिणा) दक्षिण (प्रतीची) पश्चिम (च) और (उदीची) उत्तर दिशा है ॥ जिस प्रकार सूर्य के उदय काल की दिशा का नाम पूर्व है, इसी प्रकार उदय की अपेक्षा से ठीक सामने की पश्चिम, दहिने की दक्षिण और बायें की उत्तर कहाती है ॥ १५ ॥ ८५-एतेन दिगन्तरालानि व्याख्यातानि ॥ १६ ॥ (एतेन) इसी से (दिगन्तरालानि) दिशाओं के बीच के भाग (व्याख्यातानि) कहे गये समझने चाहियें ॥ सूर्योदय से जो व्यावहारिक संज्ञा पूर्व पश्चिम दक्षिण उत्तर नियत कर ली गई हैं, उसी से यह भी समझ लेना चाहिये कि पूर्व दक्षिण के मध्य में कोण वा अन्तराल का नाम आग्नेय, दक्षिण पश्चिम के अन्तराल का नाम नैर्ऋत, पश्चिम उत्तर का बीच=वायव्य और उत्तर पूर्व का अन्तर्वर्ती दिग्भाग ऐशान्य कहाता है ॥ १६ ॥ दिशा की परीक्षा समाप्त हुई । आगे शब्द की परीक्षा करेंगे, उस का अङ्ग समझ कर प्रथम कारण और लक्षण से संशय को उत्पन्न करते हैं:- ८६-सामान्यप्रत्यक्षाद् विशेषाऽप्रत्यक्षाद् विशेषस्मृतेश्च संशयः ॥ १७ ॥ (सामान्यप्रत्यक्षात्) सामान्य प्रत्यक्ष होने, (विशेषाऽप्रत्यक्षात्) विशेष प्रत्यक्ष न होने (च) और (विशेषस्मृतेः) विशेष के स्मरण से (संशयः) संशय होता है ॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.