वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
by महर्षि कणाद
Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)
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Read in contextद्वितीयाऽध्याय १ आन्हिके ४१ जब कि समझना चाहने वाला पुरुष, किसी वस्तु के सामान्य धर्म को तो जान लेता है, और विशेष धर्म को किसी निमित्त से नहीं जान पाता वा नहीं जान सकता और विशेष का स्मरण मात्र करता है, परन्तु विशेष को पाता नहीं, तब जो द्विविधायुक्त प्रत्यय होता है, वह संशय कहाता है। जैसे अपने सामने खड़े किसी पत्थर के वा काष्ठ के बने पुतले चित्र को देख कर सामान्य बातें जो पुरुष में होती हैं, वे चित्र में भी होती हैं, उन से यह निश्चय नहीं होता कि यह पुरुष है, वा स्थाणु, वा चित्र, अब देखने वाला चाहता है कि कोई विशेष-श्वास लेना, पलक मारना, बोलना, चलना, फिरना, सुखदुःखादि का अनुभव करना इत्यादि चिन्ह पाऊं तब निश्चय करूं कि यह पुरुष है, स्थाणु नहीं, परन्तु वह यह भी सोचता है कि कदाचित् विशेष हों और मैंने अभी पहचान न पाये हों, बस जब तक स्थाणु है वा पुरुष; इन दोनों में से एक का अवधारण (फ़ैसला) बुद्धि में न आजावे, तब तक जो उभयपक्षचञ्चल ज्ञान रहता है, वह संशय कहाता है ॥ १७ ॥ ९७-दृष्टं च दृष्टवत् ॥ १८ ॥ (च) और (दृष्टं) प्रत्यक्ष (दृष्टवत्) प्रत्यक्षों के तुल्य है ॥ अर्थात् संशय तब होता है, जब एक दृष्ट पदार्थ दूसरे दृष्ट पदार्थों के समान हो और विशेष स्मरण आता हो, पर जाना न जाता हो ॥ ९८-यथादृष्टमऽयथादृष्टत्वाच्च ॥ १९ ॥ (च) और (यथादृष्टं) जैसा देखा था, उस के (अयथादृष्टत्वात्) अन्य प्रकार से देखने से ॥ देवदत्त को एक काल में हमने जटा रखाये देखा, यज्ञदत्त को मूंड मुंडाये देखा, फिर दूसरे समय में शिर पर दुपट्टा बांधे हुये देवदत्त वा यज्ञ- दत्त को देखा तो हमको यह संशय होगा कि जटिल है, वा मुण्ड । क्योंकि पहले जब कि हमने देखा था तब खुले शिर देखा था, अब शिर पर वस्त्र बांधे देखते हैं, तो अयथादृष्ट होने से जटिलत्व वा मुण्डत्व का संशय हुवा ॥ ९६-विद्याऽविद्यातश्च संशयः ॥ २० ॥ (च) तथा (विद्याऽविद्यातः) विद्या और अविद्या से (संशयः) भी संशय होता है ॥ ६