वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
by महर्षि कणाद
Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)
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Read in contextओ३म् अथ चतुर्थोऽध्यायः तत्र प्रथममाह्निकम् पृथिवी आदि ९ द्रव्यों की चतुर्थ सूत्रोक्त उद्देशक्रमानुसार उद्देश लक्षण और परीक्षायें गत तीन अध्यायों में कर चुके। अब जीवात्मा और परमात्मा= आत्मा द्रव्य को छोड़कर शेष पृथिवी आदि आठ द्रव्यों के मूल कारण प्रकृति की परीक्षा करना चाहते हुये आचार्य कणाद मुनि चतुर्थाध्याय का आरम्भ करते हुये मूल कारण प्रकृति का स्वरूप वर्णन करते हैं:— १५५—सदकारणवन्नित्यम् ॥ १ ॥ ( सत् ) जो हो ( अकारणवत् ) जिस का अन्य कारण न हो ( नित्यम् ) यह नित्य है ॥ जो पदार्थ सत्स्वरूप है, जिस का अन्य कोई कारण भी नहीं, वह नित्य पदार्थ एक मूल प्रकृति है ॥ १ ॥ और— १५६–तस्य कार्यं लिङ्गम् ॥ २ ॥ ( तस्य ) उस का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग ( कार्यम् ) कार्य है ॥ अर्थात् उस प्रथम सूत्रोक्त कारणरहित सत्स्वरूप प्रकृति का लिङ्ग उस के अनेक कार्य हैं जो पृथिवी आदि कार्यस्वरूप से प्रत्यक्ष हैं ॥ २ ॥ क्यों जी ! कार्य को कारण का लिङ्ग क्यों माना जावे ? उत्तर:— १५७–कारणभावात् कार्यभावः ॥ ३ ॥ ( कारणभावात् ) कारण के भाव से ( कार्यभावः ) कार्य का भी भाव होता है ॥ अर्थात् कारण हो तब उस से कोई कार्य उत्पन्न होता है, न हो तो नहीं। इस लिये कार्य को देखकर अनुमान से कारण की सिद्धि होती है तब कार्य को कारण का लिङ्ग ( अनुमापक ) क्यों न माना जावे ॥ यह निश्चित नियम है कि जिस के होने से जो हो और न होने से न हो, वह उस का लिङ्ग ( अनुमान कराने वाला ) होता है । अर्थात् कार्य