वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
by महर्षि कणाद
Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)
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Read in context८७ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
का भाव बिना कारणभाव के नहीं होता, यह अटूट नियम है। संसार में हम स्थूल पदार्थों को देखते हैं और फिर उन स्थूलों की बनावट में सूक्ष्म अवयवों के जोड़ देखते हैं और फिर उन सूक्ष्मोँ में भी सूक्ष्मतर अवयवों के जोड़ देखते हैं तथा फिर सूक्ष्मतर पदार्थों में भी अन्य सूक्ष्मतम अवयवों का जोड़ देखते हैं, इस प्रकार सूक्ष्म से सूक्ष्म, जिस से परे अन्य सूक्ष्म न हो उस पदार्थ का नाम परमाणु है और वे परमाणु ऐसे अनन्त हैं कि मनुष्य उन को किसी प्रकार गिन नहीं सकता इस लिये वे किसी प्रकार संख्या में नहीं आसकते। यद्यपि वे परमाणु अनन्त हैं तथापि उन को सांख्य योग और वेदान्त में सत्त्व रजस् तमस् भेद से तीन प्रकार का गुण बताया गया है और न्याय, वैशेषिक और मीमांसा में परमाणु नाम से पुकारा गया है, इन्हीं परमाणुओं को श्वेताश्वतर शाखा वाले श्वेत, रक्त और कृष्ण नाम से पुका- रते हैं, इन्हीं को कहीं प्रकाश, क्रिया और आवरण शक्ति बताया गया है। इन्हीं परमाणुओं की कोई दिव्य शक्ति है जिस को प्रमाणकुशल लोग भी पहुंच नहीं सकते, जिस का योगी भी लक्षण नहीं कर सकते और मुमुक्षु भी जिस का उल्लङ्घन नहीं कर सकते, वैज्ञानिक जिस का लक्षण नहीं कर सकते वह अप्रज्ञात, अलक्षण, अतर्क्य, अविज्ञेय, अव्यक्त कोई पदार्थ है जो इन सत्त्वादि गुणों की वा परमाणुओं की साम्यावस्था है, उसी का नाम प्रकृति है। अनेक ग्रन्थों में देवी, शक्ति, पराशक्ति, माया, महामाया, प्रकृति, अव्यक्त, अव्याकृत, प्रधान इत्यादि इसी के अनेक नाम हैं। इसी मूल प्रकृति में ब्राह्म मान से सौ वर्ष के अन्त में प्रलय अवस्था में सम्पूर्ण जगत् सोया हुवा सा अन्धकार से छिपा हुवा सा लीन हुवा रहता है, उस समय में इस प्रकृति का नाम 'स्वधा' होता है। जैसा कि वेद में लिखा हैः- न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः। आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास॥ ॠ० १०। १२९। २ अर्थात् (प्रलय काल में) न मृत्यु था, न जीवन था, न रात्रि और दिन का चिह्न था (किन्तु) स्वधा=प्रकृति के सहित वह एक (ब्रह्म) चेतन था जो निष्कम्प था और उस से परे कुछ न था ॥ २ ॥