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वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished489 pages

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Page 257

अध्याय ५५ ] देवीद्वारा नमुचिका वध; असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश २४७

सा तस्योत्पाटयामास विषाणं भुजगाकृतिम्।<br>तं प्रगृह्य करेणैव दानवावन्वगाज्जवात् ॥ ७२<br><br>तौ चापि भूमिं संत्यज्य जगमतुर्गगनं तदा।<br>वेगेनाभिसृता सा च रासभेन महेश्वरी ॥ ७३<br><br>ततो ददर्श गरुडं पन्नगेन्द्रं चिखादिषुम्।<br>कर्कोटकं स दृष्ट्वैव ऊर्ध्वरोमा व्यजायत ॥ ७४<br><br>भयान्मार्याश्च गरुडो मांसपिण्डोपमो बभौ।<br>न्यपतंस्तस्य पत्राणि रौद्राणि हि पतत्रिणः ॥ ७५उसने (चण्डमारीने) उस महिषकी साँपके आकारवाली सींगको उखाड़ लिया और उसे हाथमें लेकर वह शीघ्रतासे दानवोंके पीछे पील पड़ी। तब वे दोनों दैत्य पृथ्वी छोड़कर आकाशमें चले गये। फिर महेश्वरीने अपने गधेके साथ शीघ्रतासे उन दोनोंका पीछा किया। (देवीने) सर्पराज कर्कोटकको खानेकी इच्छावाले गरुड़को देखा। (फिर तो देवीको) देखते ही उनके रोंगटे खड़े हो गये; वे डर गये। चण्डमारीके भयसे गरुड़ मांसपिण्डके समान—लोथड़े-से हो गये। उन पक्षिराजके भयङ्कर पाँख (भयके कारण) गिर पड़े ॥ ७२—७५ ॥
खगेन्द्रपत्राण्यादाय नागं कर्कोटकं तथा।<br>वेगेनानुसरद् देवी चण्डमुण्डौ भयातुरौ ॥ ७६<br><br>सम्प्राप्तौ च तदा देव्या चण्डमुण्डौ महासुरौ।<br>बद्धौ कर्कोटकेनैव बद्ध्वा विन्ध्यमुपागमत् ॥ ७७<br><br>निवेदयित्वा कौशिक्यै कोशमादाय भैरवम्।<br>शिरोभिर्दानवेन्द्राणां तार्क्ष्यपत्रैश्च शोभनैः ॥ ७८<br><br>कृत्वा स्रजमनौपम्यां चण्डिकायै न्यवेदयत्।<br>घर्घरां च मृगेन्द्रस्य चर्मणः सा समर्पयत् ॥ ७९पक्षिराजके (गिरे हुए) पाँखों तथा कर्कोटक सर्पको लेकर चण्डमारी भयसे आर्त चण्ड और मुण्डके पीछे दौड़ी। उसके बाद तुरंत ही वह देवी चण्ड और मुण्ड नामक महान् असुरोंके निकट पहुँच गयी एवं उन दोनोंको कर्कोटक नागसे बाँधकर विन्ध्यपर्वतपर ले आयी। उस चण्डमारीने देवीके पास उन दानवोंको निवेदित करके बाद भयङ्कर कोश लेकर दानवोंके मस्तकों तथा गरुडके सुन्दर पाँखोंसे बनी अनुपम माला निर्मितकर देवीको दे दी एवं सिंहचर्मका घाघरा भी देवीको समर्पित किया ॥ ७६—७९ ॥
स्रजमन्यैः खगेन्द्रस्य पत्रैर्मूर्ध्नि निबध्य च।<br>आत्मना सा पपौ पानं रुधिरं दानवेष्वपि ॥ ८०<br><br>चण्डा त्वादाय चण्डं च मुण्डं चासुरनायकम्।<br>चकार कुपिता दुर्गा विशिरस्कौ महासुरौ ॥ ८१<br><br>तयोरेवाहिना देवी शेखरं शुष्करेवती।<br>कृत्वा जगाम कौशिक्याः सकाशं मार्यया सह ॥ ८२<br><br>समेत्य साब्रवीद् देवि गृह्यतां शेखरोत्तमः।<br>ग्रथितो दैत्यशीर्षाभ्यां नागराजेन वेष्टितः ॥ ८३<br><br>तं शेखरं शिवा गृह्य चण्डाया मूर्ध्नि विस्तृतम्।<br>बबन्ध प्राह चैवैनां कृतं कर्म सुदारुणम् ॥ ८४उन्होंने स्वयं गरुड़के अन्य पाँखोंसे दूसरी माला बनाकर उसे अपने सिरमें बाँध लिया और (फिर वे) दानवोंका खून पीने लगीं। उसके बाद प्रचण्ड दुर्गाने चण्ड और असुरनायक मुण्डको पकड़ लिया एवं कुपित होकर उन दोनों महासुरोंका सिर काट डाला। शुष्करेवती देवीने सर्पद्वारा उनके सिरका अलंकार बनाया और वह चण्डमारीके साथ कौशिकीके पास गयी। वहाँ जाकर उसने कहा—देवि! दैत्योंके सिरसे गुँथे एवं नागराजसे लपेटकर सिरपर पहने जानेवाले इस श्रेष्ठ अलंकारको धारण करें। शिवा देवीने उस विस्तृत सिरके आभूषणको लेकर उसे चामुण्डाके मस्तकपर बाँध दिया और उनसे कहा—आपने अत्यन्त भयंकर कार्य किया है ॥ ८०—८४ ॥
शेखरं चण्डमुण्डाभ्यां यस्माद् धारयसे शुभम्।<br>तस्माल्लोके तव ख्यातिश्चामुण्डेति भविष्यति ॥ ८५<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं त्रिनेत्रा<br>सा चण्डमुण्डस्रजधारिणीं वै।<br>दिग्वाससं चाभ्यवदत् प्रतीता<br>निष्षूदय स्वारिबलान्यमूनि ॥ ८६यतः आपने चण्ड और मुण्डके सिरोंका शुभ आभूषण धारण किया है, अतः आप लोकमें चामुण्डा नामसे प्रख्यात होंगी। चण्ड और मुण्डकी माला धारण करनेवाली उन देवीसे त्रिनेत्राने इस प्रकार कहकर दिगम्बरसे कहा—तुम अपने इन शत्रुसैनिकोंका विनाश करो।