वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished489 pages
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| २४८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५६ |
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| सा त्वेवमुक्ताऽथ विषाणकोट्या<br>सुवेगयुक्तेन च रासभेन।<br>निषूदयन्ती रिपुसैन्यमुग्रं<br>चचार चान्यानसुरांश्चखाद॥ ८७<br>ततोऽम्बिकायास्त्वथ चर्ममुण्डया<br>मार्या च सिंहेन च भूतसंघैः।<br>निपात्यमाना दनुपुङ्गवास्ते<br>ककुद्मिनं शुम्भमुपाश्रयन्त॥ ८८ | ऐसा कहनेपर बहुत तेज गतिवाले गधेके साथ वह देवी सींगकी नोकसे उग्र शत्रु-सेनाके दलोंका संहार करती हुई विचरण करने लगी और (इस प्रकार) असुरोंको चबाने लगी। उसके बाद अम्बिकाकी अनुगामिनियों—चर्ममुण्डा, मारी, सिंह एवं भूतगणोंद्वारा मारे जा रहे वे महादानव अपने नायक शुम्भकी शरणमें गये॥ ८५–८८॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचपनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५५॥
छप्पनवाँ अध्याय
चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज-निशुम्भ-शुम्भ-वध, देवताओंके द्वारा देवीकी स्तुति, देवीद्वारा वरदान और भविष्यमें प्रादुर्भावका कथन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुलस्त्य उवाच<br>चण्डमुण्डौ च निहतौ दृष्ट्वा सैन्यं च विद्रुतम्।<br>समादिदेशातिबलं रक्तबीजं महासुरम्।<br>अक्षौहिणीनां त्रिंशद्भिः कोटिभिः परिवारितम्॥ १<br><br>तमापतन्तं दैत्यानां बलं दृष्ट्वैव चण्डिका।<br>मुमोच सिंहनादं वै ताभ्यां सह महेश्वरी॥ २<br><br>निनदन्त्यास्ततो देव्या ब्रह्माणी मुखतोऽभवत्।<br>हंसयुक्तविमानस्था साक्षसूत्रकमण्डलुः॥ ३<br><br>माहेश्वरी त्रिनेत्रा च वृषारूढा त्रिशूलिनी।<br>महाहिवलया रौद्रा जाता कुण्डलिनी क्षणात्॥ ४ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) शुम्भने चण्ड और मुण्डको मृत तथा सैनिकोंको भगा हुआ देखकर अत्यन्त बलवान् महान् असुर रक्तबीजको (लड़नेके लिये) आज्ञा दी। उसके बाद महेश्वरी चण्डिकाने दैत्योंकी तीस करोड़ अक्षौहिणीवाली उस सेनाको आती हुई देखकर उन दोनों देवियोंके साथ सिंहके समान गर्जन किया। उसके बाद सिंहके समान निनाद (हुंकार) करती हुई देवीके मुखसे हंसके विमानपर बैठी हुई तथा अक्षमाला और कमण्डलु लिये ब्रह्माणी उत्पन्न हो गयी। क्षणभरमें ही वृषपर आरूढ़ त्रिशूलधारिणी महासर्पके कंगन पहने और कुण्डल धारण किये हुए तीन नेत्रोंवाली माहेश्वरी भी उत्पन्न हो गयी॥ १–४॥ |
| कण्ठादथ च कौमारी बर्हिपत्रा च शक्तिनी।<br>समुद्भूता च देवर्षे मयूरवरवाहना॥ ५ | देवर्षि नारदजी! मोरपंखसे सुशोभित, शक्तिरूपिणी एवं श्रेष्ठ मोरके वाहनपर आरूढ़ ‘कौमारी' देवीके कण्ठसे उत्पन्न हुई। |
| बाहुभ्यां गरुडारूढा शङ्खचक्रगदासिनी।<br>शार्ङ्गबाणधरा जाता वैष्णवी रूपशालिनी॥ ६ | गरुडपर सवार, शङ्ख, चक्र, गदा, तलवार एवं धनुष-बाण धारण करनेवाली सौन्दर्यशालिनी 'वैष्णवी' शक्ति देवीकी दोनों भुजाओंसे उत्पन्न हुई। |
| महोग्रमुशला रौद्रा दंष्ट्रोल्लिखितभूतला।<br>वाराही पृष्ठतो जाता शेषनागोपरि स्थिता॥ ७ | भारी भयङ्कर मूसल लिये, दाढ़ोंसे पृथ्वीको खोदनेवाली, शेषनागके ऊपर स्थित 'वाराही' शक्ति देवीकी पीठसे उत्पन्न हुई। |