वराह पुराण
Varaha Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextअध्याय १७० ] गोकर्णतीर्थ और सरस्वतीकी महिमा ३०७
जिनके भीतर पाप भरे हैं, वे ही मथुरावासियोंको मुझसे भिन्न देखते हैं।' इस प्रकार कहकर भगवान् कृष्ण तत्क्षण वहीं अन्तर्धान हो गये और गरुड भी वहाँसे वैकुण्ठ गये। यहाँ मरकर मनुष्य, पशु, पक्षी अथवा तिर्यग्योनिके कीड़े, पतंगेतक भी—सब-के-सब चार भुजावाले विष्णुके रूप बन जाते हैं—
यह नितान्त निश्चित है। देवि! यहाँ आकर श्रीकृष्णकी बहन भगवती एकानंशा, उनकी माता यशोदा-देवकी तथा 'महाविद्येश्वरी' देवियोंका अवश्य दर्शन करना चाहिये। यहाँके विश्रान्तितीर्थ, दीर्घविष्णु और केशवके दर्शन करनेसे सभी देवताओंके दर्शन एवं पूजनका पुण्य-फल प्राप्त होता है। [अध्याय १६८-१६९]
गोकर्णतीर्थ और सरस्वतीकी महिमा
भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब एक दूसरा प्राचीन इतिहास बताता हूँ उसे सुनो। बहुत पहले मथुरामें वसुकर्ण नामक एक प्रसिद्ध वैश्य रहता था। उसकी स्त्री सुशीला बड़ी सद्गुणवती थी, पर उसे कोई संतान न थी। देवि! एक दिन जब वह वैश्य-पत्नी 'सरस्वती' नदीके तटपर अनेक पुत्रवती स्त्रियोंको देखकर एकान्तमें खिन्न होकर रो रही थी तो एक मुनिके हृदयमें बड़ी दया आयी और उन्होंने उससे पूछा—'सुभगे! तुम कौन हो और क्यों रो रही हो?'
इसपर सुशीलाने कहा—'मैं एक पुत्रहीना स्त्री हूँ, पर मेरी सभी सखियाँ पुत्रवती हैं। यही मेरे खेदका कारण है।' इसपर मुनिने कहा—'देवि! भगवान् गोकर्णकी कृपासे तुम्हें पुत्र मिलेगा। यशस्विनि! तुम अपने पतिके साथ उनकी आराधना करो और स्नान, दीपदान-उपहार तथा अनेक प्रकारके जप और स्तोत्रोंद्वारा उन्हें प्रसन्न करनेका प्रयत्न करो।'
मुनिके इस उपदेशको सुनकर वह स्त्री उन्हें प्रणामकर अपने घर गयी और इससे अपने पतिको अवगत कराया। इसपर वसुकर्णने उससे कहा—'देवि! मुनिने जो बात कही है, यह मुझे भी आशाप्रद और अनुकूल जान पड़ती है।' अब वैश्य-दम्पति प्रतिदिन सरस्वती नदीमें स्नानकर पुष्प-धूप-दीप आदिके द्वारा गोकर्ण-महादेवकी आराधना करने लगे। इस प्रकार दस वर्ष बीत जानेपर भगवान् शंकर उनपर प्रसन्न हुए और उन्हें रूपवान् एवं गुणी पुत्र-प्राप्तिका वर दिया। फिर दसवें महीनेमें सुशीलाके एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। वसुकर्णने पुत्र-जन्मोत्सवके समय हजार गौओं, बहुत-से सुवर्ण तथा वस्त्रोंका दान किया। उसने भगवान् गोकर्णकी कृपासे उत्पन्न होनेके कारण उस बालकका नाम भी 'गोकर्ण' रखा। फिर यथासमय उसके अन्नप्राशन, चूडाकरण तथा यज्ञोपवीत आदि संस्कार कराये और वैवाहिक गोदान कराया। अब वसुकर्णका अधिकांश समय भगवान्की पूजा-उपासनादिमें बीतने लगा।
इधर गोकर्ण भी युवावस्थामें पहुँच गया, पर उसे कोई पुत्र न हुआ, अतः पिताने उसके तीन और विवाह कर दिये। इस प्रकार उसकी चार भार्याएँ हो गयीं, जो सभी परम सुन्दरी—वय, रूप और उत्तम गुणोंसे सम्पन्न थीं। फिर भी किसीको संतान-सुख सुलभ न हो सका, अतः गोकर्णने भी पुत्र-प्राप्तिके लिये धर्मकृत्य आरम्भ किये और अनेक वापी, कूप, तालाब, मन्दिर आदि निर्माण कराये। पानीके लिये पौसले तथा भोजनके लिये सदावर्तकी भी व्यवस्था की। उसने 'गोकर्णशिव'के संनिकट ही पश्चिम दिशामें भगवान् चक्रपाणिका एक बहुत बड़ा पञ्चायतन (मन्दिर) बनवाया और एक विशाल उद्यान लगवाया, जिसमें अनेक प्रकारके वृक्ष एवं पुष्प भी लगवाये। वे चारों स्त्रियाँ मन्दिरमें जाकर भगवान्की पूजा-अर्चा करतीं। इस प्रकार धर्मनिष्ठामें प्रवृत्त गोकर्णके जब सारे धन-धान्य धीरे-धीरे समाप्त