वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३०८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १७० |
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हो गये तो उसे चिन्ता हुई। यह सोचकर कि 'अब महान् कष्टका समय उपस्थित हो गया; क्योंकि माता-पिता तथा आश्रित परिवारके भोजनकी व्यवस्था मुझपर निर्भर है और धनके बिना यह कार्य सुकर नहीं' उसने पुनः व्यापार करनेके लिये मनमें निश्चय किया और कुछ सहायकोंको साथ लेकर मथुरामण्डलसे बाहर गया और कुछ क्रय-विक्रयकी सामग्री लेकर वह अपने घर आया।
एक दिन वह थोड़े विश्रामकी इच्छासे पासके एक पर्वतकी चोटीपर गया, जहाँ बहुत-सी सुन्दर कन्दराएँ थीं। वहाँ जब वह इधर-उधर घूम रहा था कि उसकी दृष्टि एक अनुपम स्थानपर पड़ी, जो स्वच्छ जलसे सम्पन्न था। वहाँ फलवाले वृक्षों और सुगन्धित लता-पुष्पोंकी भी भरमार थी। एक जगह दो पहाड़ोंकी सन्धिमें मालाकी तरह गोलाकार रिक्त स्थान पड़ा था। वहीं उसे ऐसा शब्द सुनायी पड़ा, मानो कोई अतिथिके स्वागतके लिये बुला रहा हो। इतनेमें उसकी दृष्टि एक तोतेपर पड़ी, जो एक पिंजड़ेमें बैठा था। जब गोकर्ण उसके सामने पहुँचा तो उस सुग्गेने कहा—'पान्थ! कृपया आप अपने साथियोंसहित पधारें, इस उत्तम आसनपर बैठें और पाद्य-अर्घ्य, फल-फूल स्वीकार करें। अभी मेरे माता-पिता यहाँ आकर आप सबका विशेषरूपसे स्वागत करेंगे। कारण, जो गृहस्थ आये हुए अतिथिका स्वागत नहीं करता, उसके पितर निश्चय ही नरकमें गिरते हैं। और जो अतिथियोंका सम्मान करते हैं, उन्हें अनन्त कालतक स्वर्गमें आनन्द भोगनेका अवसर मिलता है। जिस गृहस्थके घर अतिथि आकर निराश लौट जाता है, वह अपना पाप उस गृहस्थको देकर उसका पुण्य लेकर चला जाता है। अतएव गृहाश्रमीको चाहिये कि वह सब प्रकारसे प्रयत्नकर अतिथिका स्वागत करे*। अतिथि समयपर आया हो या असमयमें, वह भगवान् विष्णुके समान ही पूजाका पात्र है।'
इसपर गोकर्णने तोतेसे पूछा—'पुराणके रहस्यको जाननेवाले तुम कौन हो? वह मनुष्य धन्य है, जिसके पास तुम निवास करते हो।' इसपर उस तोतेने अपना पूर्व इतिहास बताना प्रारम्भ किया। वह बोला—‘‘पान्थ! बहुत पहलेकी बात है एक बार सुमेरुगिरिके उत्तर भागमें जहाँ महर्षियोंका निवास है, मुनिवर शुकदेव तपस्या कर रहे थे। वे प्रतिदिन पुराणों एवं इतिहासोंका प्रवचन करते, जिसे सुननेके लिये असित, देवल, मार्कण्डेय, भरद्वाज, यवक्रीत, भृगु, अङ्गिरा, तैत्तिरि, रैभ्य, कण्व, मेधातिथि, कृत, तन्तु, सुमन्तु, वसुमान्, एकत, द्वित, वामदेव, अश्वशिरा, त्रिशीर्ष तथा गोतमोदर एवं अन्य भी अनेक वेदज्ञ ऋषि-महर्षि, सिद्ध देवता, पन्नग और गुह्यक आदि आते तथा धर्मसंहिताके विषयमें शङ्काओंका निराकरण कराते। उस समय मैं वामदेव मुनिका दुराचारी शिष्य 'शुकोदर' था। मेरा बचपनसे ही ऐसा स्वभाव बन गया था कि जहाँ धर्मकथा या नीतियोंपर विचार होता, वहाँ मैं अश्रद्धालु बनकर आगे पहुँच जाता और बारंबार तर्क-वितर्क कर प्रश्न करता रहता। गुरुजी मुझे अन्यायवादी बताकर सदा रोकते रहते, पर मेरी प्रकृति नहीं गयी। वहाँ भी मैंने एक दिन यही किया, यद्यपि मेरे गुरुजीने तथा बहुत-से प्रधान मुनियोंने मुझे बहुत रोका, किंतु मैंने उनके वचनकी अवहेलना कर दी। तब शुकदेवजीने क्रोधके आवेशमें आकर मुझे शाप दे दिया और कहा कि 'यह बड़ा ही बकवादी है, अतः जैसा इसका नाम है, उसीके अनुसार यह शुक (तोता) पक्षी हो जाय'—बस क्या था, मैं तुरंत तोता बन गया। फिर मुनियोंकी प्रार्थनापर उन्होंने कहा कि—इसका रूप तो पक्षीका होगा, परंतु यह पुराणोंका जानकार होगा और सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थ इसे अवगत होंगे और अन्तमें मथुरामें मरकर यह ब्रह्मलोकको प्राप्त होगा।”
* अतिथैर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रव्रजते यदि। आत्मनो दुष्कृतं तस्मै दत्त्वा तत्सुकृतं हरेत् ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पूज्यो वै गृहमेधिना। काले प्राप्तस्त्वकाले वा यथा विष्णुस्तथैव सः ॥
(१७०। ५३-५४ तथा तुलनीय 'विष्णुधर्मसूत्र' ६७। ३३, हितोपदेश १। ६२, महाभा० १२। १९९ १२; १३ । १२६ । २६ इत्यादि