भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 320

अध्याय १७१ ] सुग्गेका मथुरा जाना और वसुकर्णसे वार्तालाप ३०९

‘पान्थ! इसके बाद मैं वहाँसे उड़कर इस हिमालयपर आकर इस गुहामें रहने लगा और सावधानीसे सदा ‘मथुरा'का नाम जपता रहता हूँ। फिर मैं एक बहेलियेके चंगुलमें फँस गया, जिससे इस पिंजड़ेमें रहना पड़ता है।' अब गोकर्ण कहने लगा—‘भद्र! मैं पापनाशिनी मथुरापुरीमें ही रहता हूँ और व्यापारसे थककर विश्रामके विचारसे यहाँ आया हूँ। इधर इन दोनोंमें इस प्रकारकी बात हो ही रही थी कि शबरकी स्त्री, जो उस समय सो रही थी, कुछ आहट पाकर नींदसे जग गयी। तोतेने उससे कहा—‘माँ! ये अतिथिरूपमें यहाँ पधारे हैं, अतः पूज्य हैं। इसपर वह स्वागतका सामान संग्रह करने लगी, इसी बीच शबर भी आ पहुँचा। तोतेने उसे भी अतिथि-सत्कारकी सलाह दी। उसने गोकर्णको प्रणाम किया और उसकी पूजा कर स्वादिष्ट फल तथा सुगन्धपूर्ण पेय पदार्थ समर्पण करके उससे कुछ वार्तालाप किया। फिर पूछा—‘अतिथिदेव! कहिये, मैं आपकी और क्या सेवा करूँ?'

गोकर्णने कहा—‘मित्र! यदि स्वागत-सत्कारके अतिरिक्त तुम मुझे अन्य कुछ भी देना चाहते हो तो मुझे इस तोतेको ही दे दो। मैं इसे मथुरामें ले जाऊँगा और अपने पुत्रके रूपमें रखूँगा। इसपर शबर बोला—‘क्या इसके बदले हमें तुम यमुना-स्नानका फल दे सकते हो? इस तोतेने मुझे बताया है कि कोई नीच योनिमें अथवा जन्मसे राक्षस ही क्यों न हो, यदि वह मथुरावास, सङ्गम-स्नान एवं द्वादशीव्रत करता है तो उसे अभीष्ट गति प्राप्त हो सकती है। जो सङ्गममें स्नान तथा भगवान् गोकर्णेश्वरका दर्शन करता है, वह यमपुरीमें नहीं जाता। उसे भगवान् श्रीहरिके लोककी ही प्राप्ति होती है।' इसपर गोकर्णने स्वीकृति दे दी। [अध्याय १७०]


सुग्गेका मथुरा जाना और वसुकर्णसे वार्तालाप

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! इस प्रकार गोकर्णने शबरसे (मथुरास्नानके बदले) उस सुग्गेको प्राप्तकर मथुरा नगरके लिये प्रस्थान किया और वहाँ पहुँचकर उस तोतेको अपने माता-पिताको सौंप दिया तथा उसका परिचय भी दे दिया। फिर कुछ दिनोंके बाद वह व्यापार करनेके लिये उस तोतेको अपने साथ लेकर अपने सहकर्मियोंके साथ समुद्रमार्गसे चल पड़ा।

इसी बीच एक दिन प्रतिकूल वायु चलनेसे समुद्रमें सहसा भयंकर तूफान आ गया, जिससे सभी पोतयात्री घबड़ा गये और ‘गोकर्ण' को लक्ष्यकर कहने लगे—‘कोई निकृष्ट एवं पापी व्यक्ति इस जहाजपर चढ़ गया है, जिसके कारण हमारी यह दुर्दशा हुई है एवं हम सभी मरे जा रहे हैं। गोकर्णने तोतेके सामने अपनी दयनीय स्थिति रखी और कहा कि ‘पुत्रहीन व्यक्तिकी बड़ी दुर्गति होती है। यहाँ जहाजमें जितने व्यक्ति हैं, उनके बीच मैं ही सबसे बड़ा पापी हूँ। अब क्या करना उचित है—यह तुम्हीं जानते हो।'

तोतेने कहा—‘पिताजी! आप खेद न करें, मैं अभी एक उपाय करता हूँ।' इस प्रकार गोकर्णको आश्वासन देकर वह तोता उड़ा और ध्रुवकी ओर उत्तर दिशामें बढ़ता गया। आगे एक योजनके ऊँचे पर्वतकी एक चोटी पड़ी, जिसे लाँघकर वह भगवान् विष्णुके सुन्दर मन्दिरके पास पहुँचा, जिसके प्रकाशसे सब ओर वहाँ बड़ी शोभा हो रही थी। उसके भीतर प्रवेश कर उसने कहा—‘यहाँ यह कौन देवता विराज रहे हैं? मैं उनसे जानना